ग़ज़ल
ज़माने से थककर जो लौटे हैं घर को,
उन्हें क्या ख़बर, घर भी बदलते होंगे।
जो घरों से ही थककर निकलते हैं चुपचाप,
वो किस दर पे जाकर सँभलते होंगे।
किसी की हँसी में जो शामिल नहीं हैं,
वो तन्हाइयों में ही जलते होंगे।
जिन्हें नींद आती नहीं रात भर अब,
वो यादों के तकियों पे ढलते होंगे।
नज़र जिनकी हर मोड़ पर भीगी-सी है,
कई हादसे दिल में पलते होंगे।
जो कहते हैं “सब ठीक है” मुस्कुराकर,
वो अंदर ही अंदर बिखरते होंगे।
किसी को तो मिलती होगी एक पनाह भी,
मगर कुछ मुसाफ़िर भटकते होंगे।
ज़माने से थककर जो लौटे हैं घर को,
जो घरों से ही थकते होंगे — कहाँ लौटते होंगे।
— हेमंत सिंह कुशवाह
