कहानी

मदद

“मैम, शीनू मैम आपको बुला रही हैं।” एक बच्चे ने कहा।
“ठीक है, मैं आ रही हूँ।” प्रभा ने कहा। कक्षा में बच्चों को गणित के सवाल देकर जब वे शीनू मैम के पास पहुँची तो वे उस समय कोई फार्म भर रहीं थीं।
“अरे प्रभा,आओ,आओ। तुमसे कुछ बहुत ही जरूरी काम था।”
“जी, क्या काम है? बताइए।”
“तुम रितेश की श्योरिटी कर दो । मैं भी कर रही
हूँ और अपने नाम कुछ लोन लेकर उसे दे दो । मैं भी दे रही हूँ। यहाँ पर कुछ और भी शिक्षक दे रहे हैं । वह इस समय बहुत ही ज़्यादा कर्ज में दब चुका है। साथ का शिक्षक है,उसकी मदद तो करनी ही चाहिए।”शीनू मैम रितेश की तरफ से उसे पूरा भरोसा भी दे रहीं थीं। उसी समय रितेश भी वहाँ आ गया और हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगा,
“दीदी, आप मेरी बड़ी बहन जैसी हो। मैं आपका एक-एक पैसा लौटा दूँगा। मैं इस समय बहुत ही परेशान हूँ।” उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे और उन आँसुओं ने प्रभा को और भी भावुक कर दिया।
“ठीक है, मैं घर में बात करके बताऊँगी।”
छुट्टी के बाद जब वह घर पहुँची तो पता चला की रितेश पहले से ही वहाँ आकर उसके पति का पैर पकड़कर मिन्नतें कर चुका है और उसके पति भी उसकी बात मान चुके हैं। अगर उसने पैसे नहीं लौटाए तो क्या होगा? प्रभा ने अपनी चिंता जाहिर की।
“अरे नहीं,वह सीधा-सीधा बन्दा है,वह पैसे लौटा देगा, हड़पेगा नहीं। बेचारा बहुत अधिक कर्ज में डूब गया है।”
दोनों ने मिलकर स्योरिटी भी दी और अपने- अपने नाम लोन लेकर भी दिया। केवल इसी उम्मीद पर की आज इसका भला होना चाहिए। कल की कल देखी जायेगी।
धीरे-धीरे समय बीतता रहा पर रितेश ने पैसे लौटाने का नाम तक नहीं लिया। इधर प्रभा और उसके पति दोनों बुरी तरह फँस चुके थे। उन्होंने अपने लिए भी लोन ले रखा था और रितेश के लिए लिये लोन के कारण उनका बजट बिल्कुल ही असंतुलित हो गया। कभी इस सोसायटी का पैसा बाकी रह जाता कभी दूसरी सोसायटी का। हर महीने डिफाल्टर की नोटिस आती रहती । इन
सबके बावजूद रितेश ने उन लोगों का पैसा नहीं लौटाया। धीरे-धीरे की साल गुजर गए किन्तु रितेश ने उन लोगों का पैसा नहीं लौटाया, उसकी नीयत में खोट आ चुका था। फोन करने पर वह फोन भी नहीं उठाता था और घर जाने पर कहला देता कि वह घर पर नहीं है। स्कूल जाने पर एक तो मिलता नहीं और मिलता भी तो वह बस एक ही लाइन बोलता- “लौटा दूँगा।” पर पैसे लौटाने का नाम ही नहीं लिया। धीरे-धीरे कई साल बीत गये पर उस इंसान ने कर्ज नहीं लौटाया। प्रभा को अब यही लगता है की अगर इस दुनिया में मदद करने का यही खामियाजा भुगतना पड़ता है तब कभी भी किसी की मदद नहीं करनी चाहिए।

— डॉ. सरला सिंह ‘स्निग्धा’

डॉ. सरला सिंह स्निग्धा

दिल्ली m-9650407240

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