विचारों पर अडिग रहने की कला
धड़ाधड़ बिकने की इस बेला में
आप याद बहुत आते हो मान्यवर,
आपके विचारों पर अडिग रहने की कला
सदियों तक रहेगा अजर अमर,
अच्छे ओहदे की नौकरी छोड़ना,
चली हुई परिपाटी तोड़ना,
गांव गांव साइकिल से जाना,
हक़ अधिकारों की बातें समझाना,
चेहरे पर थकान की शिकन न लाना,
बहुजनों के घर घर जाना,
दैदीप्यमान सूरज चमका
क्या गांव और क्या शहर,
धड़ाधड़ बिकने की इस बेला में
आप याद बहुत आते हो मान्यवर,
न पूजा न नमाज के खातिर,
सौंपा जीवन समाज के खातिर,
चाबी रखने को चांदी के छल्ले,
हर गली खड़ा है समाज के दल्ले,
चिर विरोधी से पैसा खा खा के,
नेता बनते बीच समाज में जाके,
गाड़ी मोटर व जहाज में जाते,
मरम समाज का जान न पाते,
कांशी को झूठा साबित करते ये
अनर्गल प्रलाप करते ये दिन भर,
धड़ाधड़ बिकने की इस बेला में
आप याद बहुत आते हो मान्यवर,
आपके विचारों पर अडिग रहने की कला
सदियों तक रहेगा अजर अमर।
— राजेन्द्र लाहिरी
