कौन करे रहम
जो अटल है, अजर-अमर है,
उसकी पीठ में घोंप रहे हो खंजर।
अपनी निर्दयता के मद में चूर,
कर रहे हो वनों को बंजर।
मान लिया इंसान हो, सोच सकते हो,
पर सोच तुम्हारी इतनी गिर गई क्यों?
नोचने को बदनाम हुआ गिद्ध,
पर प्रकृति को तुमने रोज़ नोचा क्यों?
कर रहे हो पर्यावरण का विनाश,
और बेशर्मी से उसे कहते हो विकास।
जंगलों के सीने में उतार दिए खंजर,
उजाड़ दिया जीवन का हर एहसास।
जो जन्मजात रक्षक थे धरती के,
उन्हें नक्सली कहकर मार दिया।
जो वृक्षों संग जीवन जीते थे,
उनका भी संसार उजाड़ दिया।
एक पेड़ लगाने की औकात नहीं,
पर काटने में तुम सबसे आगे हो।
ये केवल तुम्हारे जीवन की बात नहीं,
असंख्य जीव-जंतु भी इसके भागी हो।
पारिस्थितिकीय तंत्रों पर निर्भर
उनके जीवन का भी यही आधार,
उनके विनाश पर तुम्हारे पास
बस किंतु-परंतु का व्यापार।
आज जंगली प्राणियों पर
अस्तित्व का गहरा संकट है,
पर मानव अब भी समझ न पाया
आने वाला समय कितना विकट है।
वर्षा की कमी पर तिलमिलाते हो,
सूरज की आग में झुलसते जाते हो।
फिर अपने ही रचे संकटों से
चमत्कारों की गुहार लगाते हो।
प्रकृति से रहम की याचना करते हो,
जबकि कुदरत खुद पुकार रही—
“धूर्त इंसानों! मुझ पर भी
थोड़ी दया तुम उतारो सही।”
वरना समय साफ़ कहता है—
अपने हाथों खुद विनाशी पथ जाओगे,
यदि प्रकृति पर रहम न किया,
तो इतिहास में बस पछताओगे।
— राजेन्द्र लाहिरी
