सूक्ष्मता का विज्ञान और हिंदुत्व
परम पिता परमेश्वर द्वारा निर्मित इस सृष्टि का विस्तार और गहनता अनंत, अज्ञेय और अगम है । इस ब्रह्मांड में ना जाने कितनी आकाशगंगाएँ हैं, प्रत्येक आकाशगंगा में ना जाने कितने सौरमंडल हैं, प्रत्येक सौरमंडल में ना जाने कितने ग्रह-नक्षत्र हैं । पता नहीं किस ग्रह पर जीवन है या नहीं । विज्ञान आज तक केवल इतना ही पता लगा पाया कि ऐसे ही एक सौरमंडल में से हमारा निवास-स्थान ये ‘पृथ्वी’ नाम का ग्रह भी है; जिस पर ‘जीवन’ पाया जाता है । इस ग्रह पर करोड़ों वर्षों से ना जाने कितने प्रकार के जीवधारी जन्म लेते और मरते आए हैं । इन सभी जीवधारियों और वनस्पतियों के अस्तित्व के बावजूद ‘मनुष्य’ नामक प्राणी ने स्वयं को अब तक सर्वश्रेष्ठ सिद्ध किया है । (या कम से कम उसे ऐसा भ्रम है कि वही सर्वश्रेष्ठ है और सबको संचालित कर सकता है । ) मनुष्य-जाति की इस भीड़ में पाए जाने वाले सभी समुदायों और नृजातीय समूहों में अपनी अलग-अलग विशेषताएँ और गुण-दोष पाए जाते हैं । इन्हीं में से एक विशेषता है — ‘धर्म’ !
वर्तमान ज्ञात दुनिया में मोटे तौर पर हिंदू, बौद्ध, जैन, पारसी, यहूदी, ईसाई, इस्लाम आदि प्रमुख धर्म माने जाते हैं । ‘माने जाते’ इसलिए कहा क्योंकि ‘हिंदू’ को छोड़कर यहाँ बताए गए बाक़ी सब केवल ‘संप्रदाय’ अथवा ‘पंथ’ हैं । ‘धर्म’ केवल एक ही है — हिंदुत्व/ हिंदू धर्म । इसी का पर्यायवाची ‘सनातन धर्म’ भी है । इन सभी की अपनी-अपनी मान्यताएँ और परंपराएँ हैं परंतु सही मायनों में ‘स्थूल से सूक्ष्म की ओर’ केवल ‘वैदिक-सनातन-हिंदुत्व’ ही पहुँच सका है । बाक़ियों की तरह यह सनातन धर्म सीमित और संकुचित नहीं है । वेदों की गहराई से लेकर कैलास पर्वत की ऊँचाई तक यह सदैव ही प्रगतिशील और सूक्ष्मगामी रहा है ।
यह सूक्ष्मता एक ऐसा तत्त्व है जो कि विज्ञान की दृष्टि से भी सिद्ध है । यह वैज्ञानिक सिद्धांत इसलिए क्योंकि हम जानते हैं कि जो कुछ भी स्थूलता से सूक्ष्म की ओर जाता है; वह लाभदायक और प्रेरणास्पद होता है ।
उदाहरण के रूप में हम समझ सकते हैं कि
१•
बर्फ़ के बिना भी जीवित रहा जा सकता है लेकिन पानी तो अनिवार्यतः चाहिए । पानी के बिना भी कुछ समय तक रहा जा सकता है लेकिन वायु के बिना तो एक माइक्रोसैकेंड भी जीवित नहीं रहा जा सकता ।
२•
जो ऊर्जा फल खाने से मिलती है; उससे कहीं अधिक उसी फल का जूस पीने मिलती है ।
३•
रक्त हमारे शरीर का आधार है । पूरे शरीर में कहीं भी काट दिया जाए तो रक्त की धारा निकल आती है । लेकिन पूरे शरीर को खंड-खंड भी कर दिया जाए तो वीर्य / शुक्र-रस की एक बूँद भी नहीं मिलेगी । जबकि यही वीर्य एक नए शरीर को जन्म देता है ।
४•
नज़ले के कारण आपकी नाक बुरी तरह बंद है । कोई टैबलेट या सिरप भी उसे इतनी जल्दी और सरलता से नहीं खोल सकती; जितनी कि पानी की भाप । (भाप यानी जल का सूक्ष्मतम रूप)
इन कुछ उदाहरणों से सिद्ध हो जाता है कि यह प्रकृति स्वयं ही सूक्ष्म तत्त्व को अधिक महत्त्व देती है । ठीक यही गुण वैदिक-सनातन-हिंदुत्व का भी है । हमारे यहाँ तो ‘वाणी’ के भी चार स्तर खोजे गए हैं — परा, पश्यंती, मध्यमा और वैखरी । अष्टांग योग के अंतर्गत आने वाले ‘आठ चक्र’ भी इसी सूक्ष्मता का प्रमाण हैं । हमारे चार वेदों में ज्ञान इतनी सूक्ष्मता से भरा है कि उसे समझने में ज़रा-सी भी चूक हुई तो कुछ हाथ नहीं लगेगा । केवल प्रतीक और बिंब ही पकड़ में आ सकेंगे । (इसी ग़लती के कारण विदेशी और उनके पिछलग्गू भारतीय विद्वान ख़ूब चाहकर भी वेदों से केवल इतना समझ पाए हैं कि किसी ‘इंद्र’ नामक आर्य ने ‘वृत्र’ नामक अनार्य का वध किया था । अथवा दस राजाओं के बीच कोई घमासान युद्ध हुआ था जिसे ‘दाशराज युद्ध’ कहा जाता है ।)
इसी गुण के चलते वैदिक-सनातन-हिंदुत्व अथवा सनातन धर्म अपने आपको सदैव ही युगानुकूल परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहा है । उसके भीतर एक विशेष प्रकार की ग्रहणशीलता और नम्यता पाई जाती है । सदियों से हिंदू-समाज में निर्गुण और सगुण; दोनों प्रकार की भक्ति होती आई है । सूर्य, चंद्र, नदी, पृथ्वी, पशु, पक्षी, वनस्पति आदि सभी के भीतर सनातन दृष्टिकोण से वही ‘परम सत्ता’ विराजमान है जो कि सारे ज्ञान-विज्ञान से कहीं परे है । यह श्रद्धाभाव ही हमें सारी दुनिया से अलग और विशिष्ट बनाता है ।
‘एक व्यक्ति-एक किताब’ के पीछे चलने वाले यहूदी-ईसाई-मुसलमान आदि ‘सेमेटिक-अब्राहमिक’ संप्रदाय यह सोचते होंगे कि ये हिंदू लोग कितने पाखंडी और आडंबरधारी हैं जो हर ईंट-पत्थर को भी देवता मानकर ढोल-ढपड़े पीटने लगते हैं !
लेकिन मैं कहता हूँ कि इस देश के शतकोटि हिंदू-जन को किंचित भी प्रभावित और निराश होने की आवश्यकता नहीं है । क्योंकि यह सूक्ष्मता, सगुण-निर्गुण भक्ति, सहज श्रद्धाभाव ही आपके अस्तित्व का वास्तविक आधार है । हर दिन, हर पल को एक ‘उत्सव’ की तरह मानकर सैलिब्रेट करना ही आपकी ताक़त है । इसी को ‘हिंदू-समाज की USP’ कहते हैं ।
(हालाँकि ये भी समझने और मान लेने की बात है कि दुनियादारी के स्वार्थ, लोभ, अहंकार, मक्कारी, एक-दूसरे की टाँग-खिंचाई, परस्पर ईर्ष्या-द्वेष, थर्ड क्लास जातिवाद, भाषा अथवा क्षेत्र आदि के आधार पर भेदभाव, व्यक्ति-पूजा की प्रमादपूर्ण प्रवृत्ति आदि अवगुणों को छोड़ना ही होगा । ये अवगुण ही हिंदू-समाज के धर्म-शरीर के लिए कोढ़ बन गए हैं; जिनमें निरंतर ‘मूर्खता की खाज’ उठती ही रहती है । )
कृण्वंतो विश्वमार्यम्
✍ सागर तोमर
