गगनयान के परीक्षणों में इसरो को मिली बड़ी सफलता
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने एक बार फिर अपनी तकनीकी क्षमता और दृढ़ संकल्प का लोहा मनवाया है। भारत के पहले मानव युक्त अंतरिक्ष मिशन गगनयान की दिशा में एक और ऐतिहासिक मील का पत्थर पार कर लिया गया है। इसरो ने गगनयान मिशन के लिए अपने इंटीग्रेटेड पैराशूट टेस्ट और सब ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल फॉर एक्सपेरिमेंट्स (SOLVE) यानी सॉल्वे सॉलिड मोटर का पहला ग्राउंड टेस्ट सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। यह सफलता केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं है बल्कि यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि भारत अब अंतरिक्ष में इंसानों को भेजने और उन्हें सुरक्षित वापस लाने की अत्यंत जटिल तकनीक में पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो रहा है। गगनयान मिशन का मुख्य उद्देश्य तीन भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी की निचली कक्षा में लगभग चार सौ किलोमीटर की ऊंचाई पर ले जाना और तीन दिन के सफल मिशन के बाद उन्हें सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाना है। इस पूरे मिशन में सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील पहलू अंतरिक्ष यात्रियों की पुख्ता सुरक्षा है और हाल ही में किए गए ये परीक्षण सीधे तौर पर इसी सुरक्षा प्रणाली से जुड़े हुए हैं।
सॉल्वे सॉलिड मोटर का सफल परीक्षण क्रू एस्केप सिस्टम की विश्वसनीयता को सुनिश्चित करने के लिए एक बहुत बड़ा और निर्णायक कदम है। यह एक विशेष प्रकार का रॉकेट है जिसे इसरो ने विशेष रूप से केवल गगनयान के क्रू मॉड्यूल के उड़ान परीक्षणों के लिए विकसित किया है। इस सॉलिड मोटर को पीएसएलवी रॉकेट के स्ट्रैप ऑन मोटर के आधार पर तैयार किया गया है लेकिन इसमें गगनयान मिशन की विशेष और सख्त आवश्यकताओं के अनुसार कई बड़े बदलाव किए गए हैं। इसमें धीमी गति से जलने वाले प्रोपेलेंट का उपयोग किया गया है ताकि यह आवश्यक समय तक लगातार और नियंत्रित ऊर्जा प्रदान कर सके। इसके साथ ही इसमें सेकेंडरी इंजेक्शन थ्रस्ट वेक्टर कंट्रोल जैसी अत्यधिक उन्नत तकनीक का भी इस्तेमाल किया गया है। यह तकनीक रॉकेट की दिशा को सटीक रूप से नियंत्रित करने में मदद करती है। इस मोटर का मुख्य काम उड़ान के दौरान किसी भी आपात स्थिति में अंतरिक्ष यात्रियों वाले क्रू मॉड्यूल को मुख्य रॉकेट से तुरंत एक सुरक्षित दूरी पर खींच ले जाना है। श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में किया गया यह ग्राउंड टेस्ट यह साबित करता है कि मोटर का प्रदर्शन इसरो के कड़े मानकों पर पूरी तरह से खरा उतरा है।
इसके साथ ही इंटीग्रेटेड पैराशूट टेस्ट भी अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षित वापसी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब क्रू मॉड्यूल अंतरिक्ष से अपना मिशन पूरा करके वापस पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करेगा तो उसकी गति अत्यधिक तीव्र होगी। इस भयंकर गति को कम करने और भारी क्रू मॉड्यूल को समुद्र की सतह पर बहुत ही सुरक्षित रूप से उतारने के लिए पैराशूट प्रणाली का बिना किसी चूक के काम करना आवश्यक है। इसरो ने इस रिकवरी प्रणाली में कुल दस पैराशूट्स का एक जटिल और अचूक नेटवर्क तैयार किया है। इस प्रणाली के तहत सबसे पहले एपेक्स कवर अलग होता है जिसके तुरंत बाद गति को कम करने के लिए दो ड्रोग पैराशूट खुलते हैं। जब मॉड्यूल की तेज गति कुछ हद तक नियंत्रित हो जाती है तो अंत में तीन विशाल मुख्य पैराशूट खुलते हैं जो क्रू मॉड्यूल को बंगाल की खाड़ी या अरब सागर के पानी में बेहद सुरक्षित और धीमी गति से लैंड कराते हैं। इस पूरी प्रक्रिया को स्पलैशडाउन कहा जाता है। इंटीग्रेटेड पैराशूट टेस्ट की शानदार सफलता यह सुनिश्चित करती है कि पैराशूट खुलने की टाइमिंग और उनका तनाव सहने की क्षमता बिल्कुल सटीक है।
गगनयान मिशन भारत के लिए कई मायनों में बहुत अधिक चुनौतीपूर्ण है। इंसानों को अंतरिक्ष की यात्रा पर भेजना केवल उपग्रह भेजने से बिल्कुल अलग और कहीं अधिक जटिल वैज्ञानिक प्रक्रिया है। इसके लिए इसरो अपने सबसे भारी और भरोसेमंद रॉकेट एलवीएम थ्री का उपयोग कर रहा है जिसे मानव उड़ान के अनुकूल बनाने के लिए ह्यूमन रेटेड किया जा रहा है। ह्यूमन रेटिंग का सीधा अर्थ यह है कि रॉकेट का हर एक पुर्जा और हर एक प्रणाली शत प्रतिशत सुरक्षित और भरोसेमंद होनी चाहिए। इसके अलावा अंतरिक्ष यात्रियों के लिए मॉड्यूल के भीतर एक सुरक्षित और आरामदायक वातावरण बनाए रखना भी एक बहुत बड़ी चुनौती है। इसके लिए इसरो एक विशेष पर्यावरण नियंत्रण और जीवन रक्षक प्रणाली विकसित कर रहा है जो अंतरिक्ष यात्रियों को लगातार ऑक्सीजन प्रदान करेगी और कार्बन डाइऑक्साइड तथा नमी को नियंत्रित रखेगी। यह उन्नत प्रणाली पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक पर आधारित है जो भारतीय वैज्ञानिकों की असीमित बुद्धिमत्ता को दर्शाती है।
अंतरिक्ष से वापसी के दौरान क्रू मॉड्यूल को भयानक गर्मी का सामना करना पड़ता है। जब यह मॉड्यूल वायुमंडल की घनी परतों से तेज गति से टकराता है तो घर्षण के कारण उसका बाहरी तापमान हजारों डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। इस अत्यधिक और जानलेवा गर्मी से अंतरिक्ष यात्रियों को सुरक्षित बचाने के लिए क्रू मॉड्यूल के बाहरी हिस्से पर एक विशेष प्रकार का थर्मल हीट शील्ड लगाया गया है। यह शील्ड मॉड्यूल के भीतर के तापमान को बिल्कुल सामान्य बनाए रखने में मदद करता है। इसरो ने इस हीट शील्ड का निर्माण भी स्वदेशी रूप से किया है और इसके कई सफल परीक्षण पहले ही किए जा चुके हैं। वापसी के अंतिम चरण में भारतीय नौसेना की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाती है। जैसे ही क्रू मॉड्यूल समुद्र में गिरेगा नौसेना के कुशल गोताखोर और विशेष जहाज तुरंत वहां पहुंचकर अंतरिक्ष यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकालेंगे। इसके लिए इसरो और भारतीय नौसेना मिलकर लगातार कड़ा अभ्यास कर रहे हैं ताकि रिकवरी प्रक्रिया में एक सेकंड की भी कोई चूक न हो।
इस मिशन के लिए भारतीय वायुसेना के चार बेहद अनुभवी टेस्ट पायलटों को चुना गया है जिन्होंने रूस में अपना शुरुआती कड़ा प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। अब वे भारत में गगनयान मिशन के लिए विशेष रूप से स्थापित अत्याधुनिक सुविधाओं में आगे का तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। इन अंतरिक्ष यात्रियों को उड़ान के हर छोटे बड़े चरण और किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार किया जा रहा है। गगनयान मिशन की सफलता से भारत दुनिया का चौथा ऐसा देश बन जाएगा जिसने पूरी तरह से अपने दम पर इंसानों को अंतरिक्ष में भेजा है। इससे पहले केवल रूस अमेरिका और चीन ने ही यह असाधारण उपलब्धि हासिल की है। यह सफलता भारत की वैश्विक छवि को एक नई ऊंचाई पर ले जाएगी और अंतरिक्ष कूटनीति के क्षेत्र में भारत का दबदबा और भी अधिक मजबूत होगा।
इसके अलावा गगनयान मिशन का भारत के सामाजिक और आर्थिक विकास पर भी बहुत गहरा और सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। यह महत्वाकांक्षी मिशन देश में विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में एक नई क्रांति लाएगा। इससे युवाओं में अंतरिक्ष विज्ञान के प्रति रुचि बहुत अधिक बढ़ेगी और देश को नए वैज्ञानिक तथा कुशल इंजीनियर मिलेंगे। इस मिशन के लिए कई नई और उन्नत तकनीकों का विकास किया जा रहा है जिनका भविष्य में चिकित्सा उद्योग और अन्य क्षेत्रों में भी व्यापक उपयोग किया जा सकेगा। भारतीय अंतरिक्ष उद्योग में निजी क्षेत्र और स्टार्टअप्स की भागीदारी भी तेजी से बढ़ रही है जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक बहुत ही शानदार संकेत है। यह मिशन भारत के लिए केवल एक वैज्ञानिक परियोजना मात्र नहीं है बल्कि यह करोड़ों भारतीयों के सपनों असीम आकांक्षाओं और राष्ट्रीय गौरव का सर्वोच्च प्रतीक है।
अंत में यह कहना बिल्कुल सही और तर्कसंगत होगा कि सॉल्वे सॉलिड मोटर और इंटीग्रेटेड पैराशूट टेस्ट की इस हालिया सफलता ने गगनयान मिशन की नींव को बहुत ही ज्यादा मजबूत कर दिया है। इसरो के वैज्ञानिकों ने दिन रात एक करके इस जटिल और महंगी तकनीक को अपने ही देश में विकसित करके एक मिसाल कायम की है। अब वह स्वर्णिम दिन दूर नहीं है जब कोई भारतीय अंतरिक्ष यात्री पूरी तरह से स्वदेशी रॉकेट में बैठकर अंतरिक्ष की अनंत यात्रा करेगा और वहां तिरंगे का मान बढ़ाएगा। यह महान सफलता अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत के एक बहुत ही सुनहरे भविष्य की मजबूत शुरुआत है और पूरे देश को अपने वैज्ञानिकों की इस शानदार उपलब्धि पर बहुत गर्व है। गगनयान मिशन के हर नए चरण की सफलता के साथ भारत अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में विश्व गुरु बनने की दिशा में पूरे आत्मविश्वास के साथ मजबूती से कदम बढ़ा रहा है।
— महेन्द्र तिवारी
