सामाजिक

प्राइवेसी की नई पहल या सुरक्षा की नई चुनौती?

आज की डिजिटल दुनिया में जब भी कोई नई सुविधा आती है, तो वह अपने साथ असीम उत्साह और उतनी ही गहरी आशंकाएं लेकर आती है। वर्तमान समय में एक ऐसी ही नई तकनीकी सुविधा को लेकर देश में व्यापक बहस छिड़ गई है। इस नई व्यवस्था के तहत उपयोगकर्ता अपना मोबाइल नंबर सार्वजनिक किए बिना केवल एक विशिष्ट पहचान या गुप्त नाम के माध्यम से दूसरों से बातचीत कर सकेंगे। इस सुविधा का प्राथमिक उद्देश्य लोगों को अपनी बेहद निजी और संवेदनशील जानकारी सुरक्षित रखने का एक बेहतरीन विकल्प देना है। दूसरी ओर, सरकार और कानून व्यवस्था संभालने वाली एजेंसियों का स्पष्ट मानना है कि यदि इस व्यवस्था में पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं किए गए, तो यही सुविधा साइबर अपराधियों के लिए एक नया और खतरनाक हथियार बन सकती है।

भारत वर्तमान में दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल बाजारों में अग्रिम पंक्ति में शामिल है। देश में 80 करोड़ से भी अधिक लोग इंटरनेट का उपयोग करते हैं। करोड़ों लोग प्रतिदिन संदेश भेजने, वीडियो कॉल करने, महत्वपूर्ण दस्तावेज साझा करने और अपना व्यापार चलाने के लिए डिजिटल मंचों का उपयोग करते हैं। ऐसे विशाल बाजार में किसी भी नए तकनीकी बदलाव का असर केवल तकनीक तक सीमित नहीं रहता। इसका सीधा प्रभाव हमारे सामाजिक, आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के ढाँचे पर पड़ता है। यही मुख्य वजह है कि सरकार ने इस नई सुविधा को लेकर अत्यंत गंभीर सवाल उठाए हैं और इसके व्यापक विस्तार पर फिलहाल रोक लगाने को कहा है।

सरकार की सबसे बड़ी चिंता पहचान की चोरी और उसके दुरुपयोग को लेकर है। यदि कोई शातिर व्यक्ति किसी प्रसिद्ध बैंक, प्रतिष्ठित सरकारी संस्था, बड़े अधिकारी या किसी सार्वजनिक हस्ती से मिलता-जुलता नाम चुन ले, तो सामान्य उपयोगकर्ता आसानी से भ्रमित हो सकता है। साइबर अपराधी इसी भ्रम और मानवीय विश्वास का अनुचित फायदा उठाकर लोगों से पैसे ठग सकते हैं, उनकी बेहद निजी जानकारी हासिल कर सकते हैं या फर्जी संदेश फैलाकर समाज में अशांति पैदा कर सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि देश में फिशिंग, डिजिटल गिरफ्तारी, निवेश धोखाधड़ी और पहचान बदलकर की जाने वाली ठगी के मामलों में 300 प्रतिशत से भी अधिक की तेजी से बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

इन्हीं बढ़ते जोखिमों को देखते हुए सरकार ने संबंधित तकनीकी कंपनी से एक विस्तृत और स्पष्ट जवाब मांगा है। अधिकारियों का साफ कहना है कि बाजार में इस सुविधा को पूरी तरह लागू करने से पहले यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि यदि किसी अपराधी ने किसी अन्य व्यक्ति या संस्था की पहचान अपनाने की कोशिश की, तो उसे तकनीकी रूप से कैसे रोका जाएगा। इसके साथ ही यह भी बताना आवश्यक होगा कि किसी पीड़ित उपयोगकर्ता द्वारा शिकायत मिलने पर कंपनी की ओर से कार्रवाई कितनी तेजी से होगी। जब तक इन सुरक्षा मानकों पर स्थिति पूरी तरह साफ नहीं हो जाती, तब तक देश के करोड़ों नागरिकों की सुरक्षा को दांव पर नहीं लगाया जा सकता।

दूसरी तरफ, तकनीकी कंपनी ने अपने आधिकारिक स्पष्टीकरण में कहा है कि इस नई सुविधा का उद्देश्य किसी भी अपराधी की वास्तविक पहचान को छिपाना बिल्कुल नहीं है। इसका असली मकसद केवल मोबाइल नंबर की गोपनीयता को एक नया स्तर प्रदान करना है। समाज में बहुत से ऐसे लोग होते हैं जिन्हें अपनी दैनिक जरूरतों के लिए किसी नए ग्राहक, सहपाठी, शिक्षक, पड़ोसी या किसी अस्थायी संपर्क से बात करनी पड़ती है। ये लोग काम तो करना चाहते हैं, लेकिन सुरक्षा कारणों से अपना निजी मोबाइल नंबर उनके साथ साझा नहीं करना चाहते। विशेष रूप से महिलाओं, छात्रों, छोटे व्यापारियों और स्वतंत्र रूप से काम करने वाले पेशेवरों के लिए यह सुविधा एक सुरक्षा कवच साबित हो सकती है।

कंपनी ने यह भी साफ किया है कि यह पूरी व्यवस्था अनिवार्य नहीं बल्कि पूरी तरह से वैकल्पिक होगी। कोई भी उपयोगकर्ता यदि चाहे तो इसे अपनी सुविधा के अनुसार अपना सकता है, और यदि वह न चाहे तो पहले की तरह केवल अपने मोबाइल नंबर के माध्यम से ही संवाद जारी रख सकता है। इसका मतलब यह है कि सभी लोगों को अनिवार्य रूप से इस नई पहचान व्यवस्था में शामिल होने की कोई जरूरत नहीं होगी। कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया है कि मुख्य डिजिटल मंच का उपयोग करने के लिए मोबाइल नंबर की आवश्यकता कभी समाप्त नहीं होगी। प्रत्येक नया खाता पहले की तरह केवल वैध मोबाइल नंबर के जरिए ही बनाया जाएगा, जिससे जवाबदेही बनी रहेगी।

इस व्यवस्था का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें उपयोगकर्ताओं को खोजने के लिए कोई भी सार्वजनिक सूची या डायरेक्टरी उपलब्ध नहीं होगी। यदि किसी व्यक्ति को किसी अन्य उपयोगकर्ता को संदेश भेजना है, तो उसे उस व्यक्ति का सटीक नाम पता होना अनिवार्य होगा। इस कड़े नियम से अनजान लोगों द्वारा बड़े पैमाने पर की जाने वाली खोजबीन और अनचाहे संदेशों की संभावना काफी कम हो जाएगी। इसके अलावा, कंपनी ने दावा किया है कि कुछ बेहद महत्वपूर्ण नामों और सरकारी संगठनों के नामों को पहले से ही सुरक्षित कर दिया जाएगा ताकि कोई भी आम व्यक्ति उनका दुरुपयोग न कर सके। साथ ही नए खातों की दैनिक गतिविधियों पर एक निश्चित सीमा और निगरानी भी लागू रहेगी।

यह पूरा विवाद वास्तव में दो अत्यंत महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच एक सही संतुलन खोजने का प्रयास है। इनमें से पहला मूल्य है नागरिक की व्यक्तिगत निजता और दूसरा सबसे बड़ा मूल्य है सामूहिक सार्वजनिक सुरक्षा। आज के समय में अधिकांश लोग अपनी निजी जानकारी को अनजान लोगों के साथ साझा करने से कतराते हैं, जो कि उनका अधिकार है। दूसरी तरफ, देश की कानून व्यवस्था संभालने वाली एजेंसियां चाहती हैं कि यदि कोई गंभीर अपराध घटित होता है, तो अपराधी तक पहुंचने में उन्हें किसी भी तकनीकी रुकावट का सामना न करना पड़े। डिजिटल युग में पहचान का महत्व लगातार बढ़ रहा है और हर नई तकनीक के साथ नए सुरक्षा उपाय विकसित करना अनिवार्य हो गया है।

भारत में वर्तमान समय में साइबर अपराध की प्रकृति बहुत जटिल हो चुकी है। बैंक खातों से अवैध रूप से पैसे निकालना, नकली निवेश योजनाएं दिखाकर रातों-रात अमीर बनाने का लालच देना और नकली सरकारी अधिकारी बनकर डराना अब बहुत आम हो चुका है। राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्ट के अनुसार, देश में रोजाना हजारों लोग इस तरह की धोखाधड़ी का शिकार होते हैं। ऐसे संवेदनशील माहौल में सरकार किसी भी नई तकनीकी सुविधा का मूल्यांकन केवल उसकी आधुनिकता की दृष्टि से नहीं, बल्कि समाज पर पड़ने वाले उसके वास्तविक प्रभाव के आधार पर कर रही है। विशेषज्ञों का भी यही मानना है कि यदि किसी मंच पर मजबूत सत्यापन और त्वरित शिकायत निवारण की व्यवस्था हो, तो जोखिम को 90 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है।

साधारण उपयोगकर्ताओं की अपनी जायज चिंताएं हैं। बहुत सी महिलाएं और छात्राएं चाहती हैं कि उन्हें अपना मोबाइल नंबर हर किसी को न देना पड़े ताकि वे अवांछित कॉल्स से बच सकें। वहीं दूसरी तरफ, समाज का एक बड़ा वर्ग इस बात से भयभीत है कि कहीं इस नई सुविधा के आने से फर्जी पहचान वाले संदेशों की संख्या और अधिक न बढ़ जाए। इस पूरे विवाद से यह बात पूरी तरह शीशे की तरह साफ हो जाती है कि केवल आधुनिक तकनीक अपने आप में कभी पर्याप्त नहीं होती। तकनीक के साथ-साथ संस्थाओं पर जनता का भरोसा होना भी उतना ही जरूरी है। यदि लोगों को यह दृढ़ विश्वास होगा कि शिकायत करने पर तुरंत कार्रवाई होगी, तो किसी भी नई सुविधा को स्वीकार करना बहुत आसान हो जाएगा।

साइबर सुरक्षा केवल किसी तकनीकी मंच या सरकार की अकेले की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें उपयोगकर्ताओं की खुद की जागरूकता भी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि कोई व्यक्ति केवल एक परिचित नाम देखकर किसी पर आंख मूंदकर भरोसा कर ले और बिना पूरी पुष्टि किए पैसे भेज दे, तो नुकसान की संभावना हमेशा बनी रहेगी। इसलिए किसी भी प्रकार के आर्थिक लेनदेन से पहले व्यक्ति की वास्तविक पहचान की पुष्टि करना हमेशा आवश्यक होता है। आज के समय में डिजिटल साक्षरता हमारी सबसे बड़ी जरूरत बन चुकी है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी को यह अच्छी तरह समझना होगा कि केवल किसी स्क्रीन पर एक जाना-पहचाना नाम दिखाई देना ही सुरक्षा की गारंटी नहीं है।

पूरी दुनिया में कई बड़े संदेश मंच पहले से ही इस तरह की यूजरनेम व्यवस्था का उपयोग सफलतापूर्वक कर रहे हैं। हालांकि, हर देश की सुरक्षा व्यवस्था, वहां की स्थानीय परिस्थितियां, कानून और अपराध का स्वरूप पूरी तरह अलग होता है। इसलिए किसी एक विदेशी मॉडल को हूबहू भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में लागू करने से पहले यहाँ की जमीनी हकीकत को ध्यान में रखना बेहद आवश्यक होता है। भारत सरकार का रुख फिलहाल यही है कि पहले सभी संभावित जोखिमों का पूरी तरह से आकलन किया जाए और उसके बाद ही इस सुविधा को व्यापक रूप से देश में लागू करने की अनुमति दी जाए।

आने वाले समय में यह पूरी तरह संभव है कि सरकार और कंपनी के बीच एक विस्तृत चर्चा हो और इस व्यवस्था में कुछ नए सुरक्षा मानक जोड़े जाएं। यदि ऐसा होता है, तो हम सुविधा और सुरक्षा दोनों के बीच एक आदर्श संतुलन बनाने में सफल हो सकेंगे। आखिरकार, यह विवाद केवल एक नई तकनीकी सुविधा का नहीं है, बल्कि यह हमारे आने वाले डिजिटल भविष्य की सही दिशा तय करने का है। प्राइवेसी और राष्ट्रीय सुरक्षा को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय उन्हें हमेशा साथ लेकर चलने की आवश्यकता है। यदि मजबूत सुरक्षा व्यवस्था, पारदर्शी नियम, त्वरित शिकायत निवारण और जागरूक उपयोगकर्ता एक साथ मिल जाएं, तो हर नई तकनीक समाज के लिए कल्याणकारी साबित होगी।

— महेन्द्र तिवारी

महेन्द्र तिवारी

जन्म : फरवरी 1971, भोजपुर (बिहार) शिक्षा : स्नातकोत्तर (अर्थशास्त्र), डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा सेवाएं : भूतपूर्व वायुसैनिक एवं वर्तमान में राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली में कार्यरत कृतियाँ : विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अब तक सैकड़ों लेख, कविताएँ और कहानियाँ प्रकाशित। संपादन : ‘दि ग्राम टुडे’ लघुकथा विशेषांक (अतिथि संपादक) प्रकाशन : कहानी संग्रह - एक लेखक का पुनर्जन्म (शीघ्र प्रकाश्य) मोबाइल : (+91) 9989703240 ई-मेल : mahendratone@gmail.com

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