मनुष्य अपने ही विरुद्ध
मनुष्य ने
सबसे पहले
दूसरों को नहीं,
स्वयं को हराया।
उसने
अपने ही हाथों
विश्वास का गला घोंटा,
और फिर
ईश्वर से
सत्य माँगता रहा।
वह
लोहे से
शहर बनाता रहा,
पर
अपने भीतर
एक घर न बना सका।
वह
चाँद तक पहुँच गया,
लेकिन
अपने पिता की
आँखों तक
न लौट सका।
उसने
धरती को बाँट दिया,
धर्म बाँट दिए,
रक्त बाँट दिया,
पर
दुःख
आज भी
सबका
एक-सा है।
मनुष्य
दुनिया से नहीं,
अपने ही कर्मों से
हार रहा है।
— सुरेन्द्र कल्याण बुटाना
