मसीहा का उपकार
मेरे नस-नस में समाया है
बाबा साहेब का उपकार,
कोई नासमझ जब ना समझे,
चाहे करता रहे इंकार,
दीये बुझे थे जिन राहों में,
वहाँ उन्होंने दीप जलाया,
ठुकराए गए थे जो सदियों से,
उन्हें गले से आ लगाया,
कलम की ताकत से बदला,
इस पूरे देश का भाग्य-विधान,
हर वंचित को हक दिलवाया,
सबको दिया बराबर मान,
जो आज उठा कर सर चलते हैं,
ये उनकी ही तो देन है,
वरना इस दुनिया की नजरों में,
हम सब तो बेचेन हैं,
कोई लाख छुपाए सच को लेकिन,
इतिहास गवाही देता है,
सूरज की उज्ज्वल किरणों को,
भला कौन छुपा कर रखता है?
वो केवल एक नाम नहीं हैं,
वो तो जीने का आधार हैं,
मेरे जीवन की हर धड़कन में,
बस बाबा साहेब के विचार हैं।
— राजेन्द्र लाहिरी
