जंतर-मंतर की गूँज और देश के भविष्य की पुकार
दिल्ली के जंतर-मंतर की सड़क पर आज सिर्फ लाठियों और आंसुओं के निशान नहीं हैं, बल्कि वहां देश की आने वाली पीढ़ियों के टूटे हुए सपनों का क्रंदन गूंज रहा है। शिक्षा व्यवस्था की धज्जियां उड़ने के बाद, जब युवा और छात्र अपने हक की भीख मांगने के बजाय अपना अधिकार मांगने सड़कों पर उतरे, तो सियासत के गलियारों में सन्नाटा छा जाना चाहिए था। लेकिन इसके उलट, वहां बैरिकेड्स और खाकी का पहरा खड़ा कर दिया गया।
यह हड़ताल सिर्फ कुछ परीक्षाओं के पर्चे लीक होने या अंकों की धांधली भर का विरोध नहीं है, यह उस व्यवस्था के खिलाफ खुली बगावत है जो मेधावी छात्रों के भविष्य को दीमक की तरह चाट रही है। एक तरफ वो युवा हैं जो रातों-जागकर किताबों में अपनी आंखें फोड़ते हैं, और दूसरी तरफ वो लोग हैं जो सत्ता के सिंहासन पर बैठकर उनकी मेहनत का सौदा कर लेते हैं।
जब जंतर-मंतर से उठी आवाज संसद की देहरी तक पहुंचने की कोशिश करती है, तो लोकतंत्र के मंदिरों के बाहर लोकतंत्र का ही गला घोंटा जाता है। आंसू गैस के गोले और लाठीचार्ज इस बात का सबूत हैं कि व्यवस्था सवालों के जवाब देने से डरती है। क्या कसूर था उन छात्रों का? क्या अपने भविष्य की निष्पक्ष जांच मांगना इस देश में गुनाह हो गया है?
धर्मेंद्र शर्मा की कलम स्पष्ट मानती है कि यह आंदोलन किसी एक व्यक्ति या दल का नहीं, बल्कि हर उस मां के संघर्ष की दास्तान है जो कर्ज लेकर अपने बच्चे को पढ़ाने शहर भेजती है। जब तक शिक्षा के सौदागरों पर नकेल नहीं कसेगी और जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक जंतर-मंतर की यह आग बुझने वाली नहीं है।
कुर्सियों के सिंहासन चाहे जितने सुरक्षित कर लो, लेकिन जब युवा जागता है, तो तारीखें बदल जाती हैं। न्याय की यह लड़ाई अब रुकने वाली नहीं है—क्योंकि यह भविष्य बचाने की अंतिम जंग है।
— धर्मेन्द्र शर्मा
