सावन पर कवित्त
कवित्त – 1. आगमन
घन घुमड़ घुमड़ आए, दामिन दमके अम्बर,
पवन बहे पुरवाई, महके चंदन का कंवर।
धरती ने ओढ़ी हरियाली, पहने बूंदों का हार,
सावन आया द्वार पर, लेके खुशियों का बंवर।
कवित्त – 2. नदी और कश्ती
नदी उमड़ आई तट तोड़े, बहे जल की धार,
कश्ती डोले मस्तानी, गावे मल्लाह मल्हार।
घाट किनारे भीड़ लगी, पूजा हो गौरी की,
सावन की बाढ़ में भी, दिखे जीवन का सार।
कवित्त – 3. खेत और किसान
बीज बोया किसान ने, मेहनत का पसीना,
बारिश की बूंदों से, लहलहाया है महीना।
बैल चले कीचड़ में, हल की नोक चमके,
सावन की फुहार में, उपजे सोने का दाना।
कवित्त – 4. झूला और तीज
पीपल की डाल बंधा, झूला रंग बिरंगा,
सखियाँ झूलें गावें, गीत सावन का चंगा।
हाथों में मेहंदी रची, पायल बाजे खनक,
सावन का मेला सजा, खुशी से मन उमंगा।
कवित्त – 5. विरह
बादल गरजे रात भर, नींद न आए नैना,
तेरे बिन सूना लगे, आँगन और ये बैना।
कागज पर लिखूं खत, स्याही भीगे जाए,
सावन आया परदेसी, कब आओगे तुम सजना।
कवित्त – 6. गाँव का नजारा
कच्ची सड़क कीचड़, छप-छप चले पनिहारिन,
छप्पर से टपके बूंद, भीगे तुलसी की सारिन।
चौपाल पर बुजुर्ग बैठे, पीवें चाय की प्याली,
सावन में गाँव लगे, जैसे हो कोई राजदुलारिन।
कवित्त – 7. प्रेम
तेरी याद की बूंदें, बरसें मेरे आंगन,
भीग गई चूनर मेरी, भीगा तेरा दामन।
नदी किनारे मिलना था, कश्ती भी थी तैयार,
सावन की रात आई, पर तू न आया हमसफर।
कवित्त – 8. समापन
हरा भरा जग सारा, कोयल कूके डार,
मोर नाचे वन में, गूंजे सावन का तार।
धरती अम्बर मिलके, रचें प्रेम की कहानी,
सावन है ऋतुओं का राजा, सब ऋतुओं की सरकार।
— विकास कुमार शर्मा
