कहानी

दादी की महक

ऐसा पहली बार हुआ था कि नंदिनी घर से बाहर निकली और आदतन पलटकर पीछे देखा, पर उसे विदा करने वाला कोई नहीं था। उसकी आँखें भर आईं। उसने आँसू पोंछे और भारी कदमों से अपने गंतव्य की ओर बढ़ चली। रास्ते भर यादों की परतें खुलती चली गईं।
“अरे, मेरी नंदिनी को कोई कुछ कहेगा तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। यह मेरी राजकुमारी है।”
दादी की यह आवाज़ आज भी उसके कानों में गूँजती थी। घर में माँ, पिताजी, भैया, भाभी, दादी और नंदिनी—बस यही तो उसका संसार था। दिनभर की चहल-पहल के बाद जब सब अपने-अपने कमरों में चले जाते, तब नंदिनी अपनी दादी का हाथ थामे उनके कमरे में चली जाती। दादी के साथ खाना, उनसे बातें करना और उनकी गोद में सिर रखकर सो जाना ही उसकी दुनिया थी।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। एक दिन दादी अचानक बीमार पड़ीं और मात्र दस दिनों के भीतर इस संसार को छोड़ गईं।
अंतिम संस्कार के बाद घर लौटा तो सब अपने-अपने कमरों में चले गए। माँ-पिताजी एक कमरे में, भैया-भाभी दूसरे कमरे में… और नंदिनी पहली बार अपने कमरे में बिल्कुल अकेली थी।
उस रात वह दादी को ढूँढ़ती रही—उनकी गोद, उनका स्पर्श, उनकी महक… सब कुछ। वह फूट-फूटकर रोई, पर उसकी वेदना सुनने वाला कोई नहीं था। उसी दिन उसकी हँसी जैसे कहीं खो गई। दादी की राजकुमारी समय से पहले ही बड़ी हो गई।
समय ने उसके घावों को भरने का अवसर भी नहीं दिया था कि एक और दुख उसके जीवन में उतर आया। माँ भी इस संसार से चली गईं।
अब पिता बिल्कुल अकेले थे। जो नंदिनी कभी रसोई तक नहीं जाती थी, वही पिता की सबसे बड़ी ताकत बन गई। उनके भोजन, दवा, देखभाल और हर छोटी-बड़ी आवश्यकता का ध्यान रखना ही उसकी दिनचर्या बन गई। भैया-भाभी साथ थे, पर उनकी अपनी जिम्मेदारियाँ थीं। नंदिनी ने अपने अकेलेपन को भीतर ही भीतर समेट लिया।
एक दिन किसी आवश्यक कार्य से उसे भोर के चार बजे घर से निकलना पड़ा। पिता गहरी नींद में थे। वह उन्हें जगाना नहीं चाहती थी। धीरे से दरवाज़ा बंद किया और बाहर आ गई।
कुछ कदम चलने के बाद उसने आदतन पलटकर देखा।
चारों ओर सन्नाटा था।
आज दरवाज़े पर कोई नहीं था, जो कहे—”सावधानी से जाना बेटी… पहुँचकर फोन कर देना।”
उसकी आँखें छलक उठीं। वह ऑटो में बैठकर स्टेशन की ओर चल पड़ी। स्टेशन पहुँचते ही उद्घोषणा हुई— “यात्रियों कृपया ध्यान दें… गाड़ी संख्या 1234 प्लेटफ़ॉर्म संख्या एक पर आने वाली है।”
उद्घोषणा की आवाज़ ने उसकी तंद्रा तोड़ दी, लेकिन उसका मन अब भी दादी की गोद में सिर रखे बैठा था। उसे लगा जैसे वह आज भी उसी स्नेहिल स्पर्श, उसी अपनत्व और उसी महक की तलाश में भटक रही है।
उसने धीरे से अपनी बाँहों में स्वयं को समेट लिया, मानो दादी का आलिंगन महसूस कर रही हो। तब उसे एहसास हुआ— कुछ लोग जीवन से चले जाते हैं, पर उनकी महक कभी नहीं जाती। वह हमारे अस्तित्व का हिस्सा बनकर जीवन भर हमारे साथ चलती रहती है।

— सविता सिंह मीरा

*सविता सिंह 'मीरा'

जन्म तिथि -23 सितंबर शिक्षा- स्नातकोत्तर साहित्यिक गतिविधियां - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित व्यवसाय - निजी संस्थान में कार्यरत झारखंड जमशेदपुर संपर्क संख्या - 9430776517 ई - मेल - meerajsr2309@gmail.com

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