यह युग
यह युग ऐसा चल रहा
जहाँ मौत मुँह खोले बैठी है
इंसानों की जिंदगी सूखे पत्तों की तरह हो गई है
कभी हवा का झोंका तो कभी आग की लपटे
मसलकर राख कर देती है
विकास की सड़के
दुर्घटनाओं को अंजाम दे रही
मारे जा रहे लोग
गाड़ियों के बीच पिसकर
होटल की इमारते
लुभाते हैं बहुत हैं
पर लोगों की, सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं
चंद पैसे बचाने की खातिर
खेल जाते हैं लोगों की जिंदगी से
पैसे की तृष्णा इंसान को खोखला बनाती जा रही
नहीं रही सम्वेदनाएं
न किसी के दर्द का एहसास
ओह,
ये दुनिया और दुनियावाले…
इतने कठोर तो न थे
प्राकृतिक आपदाएं भी अब कहर बरसाती
जैसे झेल रही वो हमें
और हम मनुष्य बार- बार चुनौती दे चिढ़ा रहे उन्हें….
इन सबके बीच
ऐसा लगता है हमारी जिंदगी मौत से,
बस एक कदम की दूरी पर है
— बबली सिन्हा
