चिट्ठियों का मान
नन्हे-नन्हे हाथ में,
चिट्ठियों का मान।
ढूँढ़ रहा प्रज्ञान है,
बीते कल की शान॥
कागज़-कागज़ बोलते,
जीवन के आधार।
संघर्षों की रोशनी,
मिली आज उपहार॥
शब्द नहीं बस पत्र ये,
सपनों का संसार।
हर अक्षर में बस रहा,
जीवन का विस्तार॥
सम्मानों की गंध है,
रिश्तों की मिठास।
साधना के हर कदम,
लिखते नया इतिहास॥
पापा की हर चिट्ठियाँ,
अनुभव का भंडार।
नन्हा मन उत्सुक बना,
जाने उनका सार॥
बीते वर्षों की धरोहर,
स्नेह भरे उपहार।
पढ़-पढ़कर प्रज्ञान ने,
जोड़े नए विचार॥
कल जिसने इतिहास रचा,
आज वही पहचान।
अगली पीढ़ी सीखती,
उसका हर अभियान॥
— डॉ. सत्यवान सौरभ
