मैं नवजुगाड़वाद का लेखक हूँ
मैं नवजुगाड़वाद का लेखक हूँ । ठंडा दूध भी फूंक-फूंककर पीता हूँ। उदार हृदय होने के कारण सरकार की बुराई करने में अक्षम हूँ। आलोचना कभी कर ही नहीं सकता। भले सरकार मेरी टोपी उतार कर पहन ले लेकिन मैं सरकार से अपनी टोपी नहीं छीनूंगा।
मैं सरकार का नमक खाया हूँ। मैं सरकार के प्रति वफादार हूँ। मैं एक बिंदु भी सरकार के खिलाफ नहीं लिख सकता हूँ। मुझे सरकार से बहुत उम्मीद है। मैं सरकार का हर तलवा चाट सकता हूँ। उसके सामने मेरा सिर झुका सा रहेगा। ऊंची आवाज में कभी बात नहीं कर सकता हूँ।
यही सब मेरा आदर्श वाक्य है। सरकार की प्रशंसा में मै एक-एक शब्द सांचे में डालकर लिखूंगा। सरकार के गले में पुष्पमाला पहनाकर रखूंगा। सरकार ही माई बाप है। सरकार अगर मेरी टांग भी तोड़ देगी तो भी न्यायालय का दरवाजा नहीं खटखटाऊंगा। तरह-तरह का अत्याचार भी करती है तो उसे अमृत का प्याला समझकर पी लूंगा।
पर मैं सत्य की राह पर डटा रहूंगा। सत्ता के पक्ष में मज़बूत बल्ली-बांस की तरह पूरी तरह से टेक दिये खड़ा रहूंगा। एक वीर पुरुष की भांति सरकार की सुरक्षा में प्राण त्याग दूंगा। कभी भी विरोधी पक्ष नहीं बनूंगा।
मेरा बेटा छात्र के रूप में सरकार का विरोध कर रहा होगा। तब भी बेटे का पक्ष नहीं लूंगा। सरकार का हर संभव साथ दूंगा। यह मेरे सच्चे लेखक होने का प्रमाण है। आप लोग किसी को मत बताना। दरअसल हम सरकार से वो चीज हासिल करना चाहते हैं ताकि मैं एक अमर कृति की तरह साहित्य के सुनहरे इतिहास में दर्ज हो जाऊँ।
नवजुगाड़वाद में एक जुगाड़ के चक्कर में हूँ। सरकार से पद्म विभूषण मिल जाता तो अपना जलवा कायम हो जाता। पद्म भूषण भी दे देगी तो हमें कोई परहेज नहीं है। पद्म श्री भी अगर मिल जाये तो भी संतोंष कर लूंगा। जिंदगी भर सरकार के नाम का माला जपता रहूँगा। कोई मेरा कुछ उखाड़ नही सकता। जब संइया भये कोतवाल तो काहे का डर।
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
