मोहन काका,साइकिल और वो बीस का नोट
बात उन दिनों की है जब कैलेंडर के पन्ने साल 1982 पर ठहरे हुए थे। मैं श्री नीलकंठेश्वर महाविद्यालय, खंडवा से बीएससी की पढ़ाई कर रहा था। तब कचहरी के पास स्थित एस. एन. कॉलेज का वह हॉस्टल मेरा ठिकाना हुआ करता था,और मेरा कमरा था, कमरा नंबर एक।
उन दिनों ज़िंदगी बहुत सीधी और पैदल कदमों पर चलती थी। कॉलेज जाने के लिए रास्ते नापने होते थे, और सुबह-शाम खाना खाने के लिए हॉस्टल से बुधवारा रेस्तरां तक का सफर भी पैदल ही तय होता था। उस ज़माने में साइकिल होना भी एक खूबी थी, और मोटरसाइकिल की तो कल्पना करना भी मानो किसी रईसज़ादे के ख्वाब जैसा था, जो सिर्फ गिने-चुने लोगों के पास हुआ करती थी।
जब छुट्टियों में अपने गांव बलड़ी लौटना हुआ, तो मैंने वालिद साहब के सामने साइकिल की हसरत ज़ाहिर की। पापा ने खंडवा में रहने वाले अपने पुराने अजीज़, मोहनलाल शर्मा जी को एक ख़त लिखा। मैं उन्हें ‘काका’ कहा करता था—वे बलड़ी पुलिस थाने में पुलिसमेन थे और अक्सर पापा की दुकान पर आया करते थे, बाद में उनका तबादला खंडवा हो गया था। पापा ने खत में उनसे दरख्वास्त की थी कि मेरे लिए कहीं से एक अदद साइकिल का बंदोबस्त करवा दें।
मोहन काका ने बुधवारा में इस्माइल चाचा से बात पक्की कर ली, जिनकी साइकिल की दुकान हुआ करती थी। गाड़ी की कीमत तय हुई—दो सौ बीस रुपये (220 ₹)। उन दिनों मोहन काका शायद अपनी नौकरी से चिकित्सीय अवकाश पर थे, उनकी तबीयत भी कुछ नासाज़ रहती थी। पुलिस विभाग का अस्पताल उनके घर के पास ही था, जहाँ अक्सर मैं उनके साथ आया-जाया करता था। काका का घर मेरे हॉस्टल के करीब ही होने के कारण मेरा वहाँ रोज़ का उठना-बैठना था, और वे भी बेटे की तरह मेरा पूरा ख्याल रखते थे।
इन्हीं दिनों, अचानक किसी ज़रूरत के तहत काका ने मुझसे बीस रुपये उधार मांग लिए। तब तक उन्हें वेतन भी नहीं मिला था और सेहत भी ठीक नहीं चल रही थी। मैंने बिना एक पल गंवाए अपनी जेब से बीस रुपये का नोट निकालकर उनके हाथ पर रख दिया। काका ने स्नेह से कहा, ” बेटा, तुम्हें जल्द ही लौटा दूंगा।”
इसके बाद, साइकिल की रकम का बंदोबस्त करने के लिए मुझे वापस अपने गांव बलड़ी जाना पड़ा। दो सौ बीस रुपये उस दौर में बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी। पापा ने जैसे-तैसे इंतज़ाम करके मुझे बीस-बीस रुपये के ग्यारह नोट दिए और हिदायत दी—”बेटा, संभाल कर ले जाना और मोहन काका को देकर अपनी साइकिल ले लेना।”
मेरा दिल खुशी से झूम रहा था। यह सोचकर ही राहत थी कि अब कॉलेज और रेस्तरां के फेरे पैदल नहीं काटने पड़ेंगे।
अगली ही सुबह मैं वापस खंडवा लौट आया। कॉलेज खत्म होने के बाद, शाम के करीब छह बजे मैं सीधे काका के पास पहुँचा। वे अपने घर से थोड़ी दूर एक पास की दुकान पर बैठे मिल गए। मुझे देखते ही उनके चेहरे पर अपनेपन की मुस्कान तैर गई—” बेटा, आ गए तुम!”
मैंने बिना देर किए अपने छोटे से सूटकेस में रखी वह रकम निकाली। मैंने पैंट की मोरी में उन नोटों को तह करके दबाया था, ठीक वैसे ही जैसे घर से लेकर चला था और लाकर सीधे काका के हवाले कर दिया। काका ने बिना गिने ही वे नोट अपने हाथ में रख लिए। फिर मुझसे बोले, “बेटा, ज़रा घर जाओ और चाची से कहना कि बाज़ार जाना है, एक कैरी बैग दे दें। कुछ और भी ज़रूरत का सामान लाना हो तो पूछ लेना। फिर अपन बुधवारा बाज़ार चलेंगे और उधर से ही साइकिल लेते आएंगे।”
मैं दौड़ता हुआ चाची के पास गया और पलक झपकते ही वापस लौट आया। जब मैं पहुँचा, तो काका मुस्कुराते हुए बोले—” बेटा, इसमें बीस रुपये कम हैं।”
मैं अवाक रह गया। मेरे पाँव के नीचे से ज़मीन खिसक सी गई। मैं समझ ही नहीं पा रहा था कि क्या बोलूँ, बस स्तब्ध खड़ा रहा। तभी काका ने वही बीस रुपये का नोट मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा—”यह लो, अपने बीस रुपये रखो।”
मेरा दिल अंदर तक मचल उठा। मन अजीब सी कशमकश में घिर गया—क्या वाकई काका ऐसा कर सकते हैं? यह कैसे मुमकिन था कि मैं घर से पूरे पैसे लेकर आऊँ, और काका उन्हीं पैसों में से बीस रुपये मुझे वापस थमा दें? काका पर शक करना मेरे संस्कारों के खिलाफ था, क्योंकि वे ऐसा कभी नहीं कर सकते थे। लेकिन फिर सवाल वही था—आखिर वो बीस का नोट गया कहाँ? उस दौर में बीस रुपये का गायब होना मेरे लिए किसी बड़े सदमे से कम नहीं था।
मन का उल्लास, साइकिल मिलने की वो सारी खुशी पल भर में काफूर हो चुकी थी। सिर पर एक अनसुनी चिंता सवार थी। हम चुपचाप बुधवारा बाज़ार की तरफ चल पड़े, साइकिल भी ले ली और लौट भी आए… लेकिन मेरा मन वहीं उलझा रहा, बार-बार रब से यही दुआ मांगता रहा“खुदाया, नोट मिले या न मिले, कम से कम इस पहेली की सच्चाई सामने आ जाए।”
वह शाम खंडवा की ठंडी हवा में उतरी तो ज़रूर, लेकिन मेरे ज़हन में एक अजीब सा सन्नाटा छोड़ गई थी। तकरीबन दो-तीन दिन यूँ ही कशमकश में गुज़र गए। मन के किसी कोने में वह बीस रुपये के गायब होने की टीस और उस पहेली का काँटा चुभ रहा था कि आख़िर माज़रा क्या था?
फिर एक रोज़ कुछ दोस्त मेरे हॉस्टल वाले कमरे (कमरे नंबर एक) पर आ गए। कॉलेज की थकान और दोस्तों की चहल-पहल से कमरा अचानक ही जीवंत हो उठा। महफ़िल जमी तो मैंने सोचा कि क्यों न गर्मागर्म चाय बनाई जाए। मैं स्टोव के पास चाय की तैयारी में लग गया।
एक दोस्त आते ही सीधे मेरे बिस्तर पर पसर गया, बाक़ी दोस्त इधर-उधर कुर्सियों और फर्श पर अपनी बैठकों में मशगूल थे। माहौल बिल्कुल सहज और हल्का-फुल्का था। तभी बिस्तर पर लेटे हुए उस दोस्त की नज़र अचानक ऊपर पड़ी।
मेरे बिस्तर के ठीक ऊपर छत की उस रस्सी पर, जहाँ अक्सर रोज़मर्रा के कपड़े टाँगे जाते थे, मेरी वही पैंट लटक रही थी जो मैंने उस दिन पहनी थी… और उसी पैंट की मोरी में वह बीस रुपये का नोट फंसा हुआ मुस्कुरा रहा था! दोस्त ने ज़ोर से आवाज़ लगाई—“अरे वाह मुश्ताक! तेरी पैंट की मोरी में ये बीस का नोट क्या कर रहा है भाई?”
उस एक आवाज़ के साथ ही मानो दिमाग में जमा कोहरा छट गया। बरसों पुरानी और उस दिन की उलझी हुई वह सारी गुत्थी एक ही पल में पूरी तरह सुलझ गई! ओह गॉड! उस दिन जब मैंने सूटकेस से पैसे निकाले थे, तो हड़बड़ी या अनजाने में वही बीस का नोट पैंट की मोरी में ही अटका रह गया था और काका को पैसे देते वक्त वह गिनती से कम रह गया था। काका निर्दोष थे, और मेरा शक महज़ एक गलतफहमी था। सच्चाई सामने आते ही मन का भारी बोझ एक ही झटके में उतर गया और चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान तैर गई!
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
