जवाबदेही केवल सत्ता की नहीं, समाज की भी होनी चाहिए
लोकतंत्र में जवाबदेही का सबसे अधिक आग्रह सत्ता और पद पर बैठे लोगों से किया जाता है। किसी मंत्री के विभाग में भ्रष्टाचार हो जाए, किसी अधिकारी के क्षेत्र में अपराध बढ़ जाए, किसी शिक्षक के विद्यालय का परिणाम खराब आ जाए या किसी पुलिस अधिकारी के क्षेत्र में कानून-व्यवस्था बिगड़ जाए, तो सबसे पहले उसी पदाधिकारी से जवाब मांगा जाता है। यह उचित भी है, क्योंकि अधिकार के साथ उत्तरदायित्व जुड़ा होता है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या समाज स्वयं अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो सकता है? क्या हर अपराध का दोष केवल सरकार, प्रशासन और व्यवस्था पर डाल देना पर्याप्त है? क्या नागरिक होने के नाते हमारी कोई जवाबदेही नहीं बनती?
लोकतंत्र केवल सरकार का नाम नहीं है। लोकतंत्र सरकार और समाज की साझी व्यवस्था है। संविधान ने नागरिकों को जितने अधिकार दिए हैं, उतने ही मूल कर्तव्य भी सौंपे हैं। यदि हम केवल अधिकारों की बात करें और कर्तव्यों को भूल जाएँ, तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ जाता है। यही कारण है कि आज अनेक सामाजिक समस्याओं के मूल में केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि नागरिक उत्तरदायित्व का अभाव भी दिखाई देता है।
जब कोई व्यक्ति चोरी करता है, हत्या करता है, बलात्कार करता है, साइबर ठगी करता है, नशे का कारोबार करता है या संगठित अपराध का हिस्सा बनता है, तो वह केवल किसी एक व्यक्ति का नुकसान नहीं करता, बल्कि पूरे समाज की शांति और व्यवस्था को प्रभावित करता है। ऐसे अपराधों की रोकथाम के लिए कानून और न्यायालय हैं, जो अपराध की प्रकृति के अनुसार दंड निर्धारित करते हैं। लेकिन इसके साथ यह प्रश्न भी उठता है कि क्या अपराध सिद्ध होने के बाद राज्य द्वारा दी जाने वाली कुछ सुविधाओं पर भी पुनर्विचार होना चाहिए? इस विषय पर समय-समय पर बहस होती रही है, विशेषकर जघन्य अपराधों के संदर्भ में।
हालाँकि यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत को समझना आवश्यक है। भारत में प्रत्येक नागरिक को कानून के समक्ष समानता, न्यायिक प्रक्रिया और मानव गरिमा का अधिकार प्राप्त है। इसलिए किसी भी व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर नहीं, बल्कि विधिसम्मत न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही दंडित किया जा सकता है। साथ ही, राज्य द्वारा मिलने वाली अनेक मूलभूत सुविधाएँ—जैसे शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएँ और जीवनरक्षक सहायता—मानवीय और संवैधानिक दायित्वों से भी जुड़ी हैं। अतः किसी अपराध के कारण “हर सरकारी सुविधा से आजीवन वंचित कर देना” न तो व्यावहारिक है और न ही वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप माना जाएगा।
हाँ, यह अवश्य विचारणीय है कि जिन व्यक्तियों को गंभीर अपराधों में न्यायालय द्वारा दोषी ठहराया गया हो, उनके लिए कुछ वैधानिक परिणाम और कठोर हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, चुनाव लड़ने की अयोग्यता, सरकारी नौकरी के लिए प्रतिबंध, हथियार लाइसेंस पर रोक, कुछ प्रकार के सरकारी पदों के लिए अयोग्यता, या अपराध की प्रकृति के अनुसार विशेष सरकारी योजनाओं में सीमाएँ—ऐसे विषय कानून बनाकर तय किए जा सकते हैं। लेकिन यह सब न्यायिक प्रक्रिया और संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर ही होना चाहिए।
दूसरी ओर, समाज को भी यह स्वीकार करना होगा कि अपराध केवल पुलिस की विफलता से पैदा नहीं होते। परिवारों में संस्कारों का क्षरण, विद्यालयों में चरित्र निर्माण पर घटता ध्यान, सोशल मीडिया पर फैलती हिंसक और घृणास्पद सामग्री, नशे का बढ़ता प्रभाव और कानून तोड़ने को “चालाकी” समझने वाली मानसिकता भी अपराधों को जन्म देती है। यदि समाज इन कारणों पर मौन रहेगा, तो केवल सरकार बदलने से अपराध समाप्त नहीं होंगे।
आज हम अक्सर देखते हैं कि सड़क दुर्घटना हो तो लोग हेलमेट नहीं पहनते, फिर सरकार को दोष देते हैं। टैक्स चोरी स्वयं करते हैं, फिर विकास कार्यों की कमी पर शिकायत करते हैं। रिश्वत देने वाला और लेने वाला दोनों समाज से ही आते हैं। अवैध निर्माण नागरिक करते हैं और दोष प्रशासन को मिलता है। परीक्षा में नकल विद्यार्थी करते हैं, लेकिन पूरी शिक्षा व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। यह दृष्टिकोण अधूरा है।
जवाबदेही का अर्थ केवल दंड नहीं, बल्कि आत्मानुशासन भी है। यदि नागरिक स्वयं कानून का पालन करें, अपराध की सूचना दें, गवाह बनने से न डरें, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करें और अपने बच्चों को नैतिक शिक्षा दें, तो अपराधों की संख्या स्वाभाविक रूप से घट सकती है। एक जागरूक समाज किसी भी पुलिस बल से अधिक प्रभावी सुरक्षा कवच बन सकता है।
इस संदर्भ में पुनर्वास की अवधारणा को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। सभी अपराध एक जैसे नहीं होते और सभी अपराधी भी एक जैसे नहीं होते। अनेक लोग परिस्थितियों, अपरिपक्वता या गलत संगति के कारण अपराध की ओर चले जाते हैं और बाद में सुधार भी करते हैं। आधुनिक न्याय व्यवस्था केवल दंड पर नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्स्थापन पर भी बल देती है। यदि समाज किसी व्यक्ति को सुधार का अवसर ही न दे, तो उसके पुनः अपराध की ओर लौटने की संभावना बढ़ सकती है। इसलिए कठोरता और संवेदनशीलता के बीच संतुलन आवश्यक है।
लोकतंत्र में यह सिद्धांत भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि राज्य का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि एक सुरक्षित, न्यायपूर्ण और मानवीय समाज का निर्माण करना है। इसलिए नीतियाँ ऐसी होनी चाहिएँ जो अपराध को हतोत्साहित करें, पीड़ितों को न्याय दें, दोषियों को कानूनसम्मत दंड दें और जहाँ संभव हो, सुधार का अवसर भी उपलब्ध कराएँ।
इसी प्रकार पद पर बैठे व्यक्तियों की जवाबदेही भी कम नहीं हो सकती। यदि कोई अधिकारी अपने दायित्व का निर्वहन नहीं करता, कोई मंत्री भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है या कोई जनप्रतिनिधि अपने संवैधानिक कर्तव्यों की उपेक्षा करता है, तो उसके विरुद्ध भी कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। अधिकार और जवाबदेही का संबंध दोनों पक्षों पर समान रूप से लागू होता है—सत्ता पर भी और समाज पर भी।
भारत को यदि वास्तव में अपराध-मुक्त, अनुशासित और उत्तरदायी राष्ट्र बनाना है, तो हमें “केवल सरकार जिम्मेदार है” और “केवल जनता दोषी है” जैसी अतिवादी सोच से आगे बढ़ना होगा। अपराध रोकना सरकार, न्यायपालिका, पुलिस, परिवार, विद्यालय, मीडिया और नागरिक—सभी की साझा जिम्मेदारी है। एक पक्ष की विफलता दूसरे पक्ष को दायित्व से मुक्त नहीं कर सकती।
अंततः, लोकतंत्र की सफलता इसी में है कि अधिकार और कर्तव्य दोनों साथ-साथ चलें। पद पर बैठे व्यक्ति अपनी जवाबदेही निभाएँ, कानून निष्पक्ष रूप से लागू हो और नागरिक भी अपने आचरण के प्रति उत्तरदायी बनें। समाज तब ही सशक्त होगा जब न्याय केवल दूसरों के लिए नहीं, स्वयं पर भी समान रूप से लागू करने की मानसिकता विकसित होगी। जवाबदेही का दायरा जितना व्यापक होगा, लोकतंत्र उतना ही मजबूत, न्यायपूर्ण और विश्वासपूर्ण बनेगा। यदि चाहें, मैं इसी विषय पर अधिक तीखा, राजनीतिक-व्यंग्यात्मक या अख़बार के संपादकीय शैली वाला संस्करण भी तैयार कर सकता हूँ।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
