देर तो बहुत कर दी
विदेश में रहते हुए उसे कई वर्ष बीत गए थे। अच्छी नौकरी, अपना घर, पत्नी और बच्चों से भरा संसार—जीवन में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। बस, उस संसार में माँ के लिए समय कम होता गया था।
पिता के रहते माँ को कभी अकेलापन महसूस नहीं हुआ। दोनों एक-दूसरे का सहारा थे। फिर एक दिन पिता चले गए। माँ अचानक उस बड़े-से घर में अकेली रह गई।
कुछ महीनों तक वह जैसे-तैसे पड़ोसियों और रिश्तेदारों के सहारे दिन काटती रही, लेकिन उम्र अब उसका साथ छोड़ रही थी। हाथ काँपते थे, घुटनों में दर्द रहता था और रोज़मर्रा के छोटे-छोटे काम भी कठिन लगने लगे थे।
एक शाम माँ ने विदेश में रह रहे बेटे को फोन किया- “बेटा…” कुछ क्षण चुप रहने के बाद उसकी आवाज़ आई, “तुम्हारे पापा के जाने के बाद मैं बिल्कुल अकेली पड़ गई हूँ। अब हाथ-पैर भी पहले जैसे काम नहीं करते। तुम अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो… मैं तुम्हें परेशान भी नहीं करना चाहती। लगता है, अब मुझे वृद्धाश्रम में ही रहना पड़ेगा।”
बेटे के हाथ में पकड़ा मोबाइल जैसे ठहर गया। वह कुछ कह पाता, उससे पहले माँ ने धीमे स्वर में कहा— “कोई बात नहीं बेटा… माँ हूँ, बच्चों की मजबूरी समझती हूँ।” फोन कट गया।
उस रात वह देर तक सो नहीं सका। अगली सुबह उसने पत्नी से कहा, “मैं माँ को लेने जा रहा हूँ।”
कुछ दिनों की तैयारी के बाद वह विदेश से भारत आ गया। दरवाज़ा माँ ने खोला। सामने खड़े बेटे को देखकर उसकी आँखें भर आईं। उसने बेटे के सिर पर हाथ रखा। चेहरे पर उम्र की गहरी लकीरें थीं, बाल लगभग सफेद हो चुके थे और चलते समय कदमों में पहले जैसी दृढ़ता नहीं थी।
माँ ने मुस्कराकर पूछा— “थक गया होगा बेटा… चाय बनाऊँ?”
विदेश में रहते हुए उसने वर्षों से चाय नहीं पी थी। लेकिन माँ की आवाज़ सुनते ही उसके भीतर जैसे बचपन का कोई बंद दरवाज़ा खुल गया।
वह मुस्कराया— “माँ, तुम्हारे हाथ की चाय तो मेरे बचपन की सबसे मीठी याद है।”
माँ धीरे-धीरे रसोई में चली गई।
बेटा वहीं बैठा उसे देखता रहा। वही रसोई थी, वही चूल्हा था, वही कप-प्याले थे… बस माँ के कदमों में अब वह तेजी नहीं थी। कुछ देर बाद माँ काँपते हाथों से चाय लेकर आई। बेटे ने कप उठाया। एक घूँट लिया और अनायास कह बैठा— “माँ… आज वो पहले वाला स्वाद नहीं है।”
माँ हँस पड़ी। “अब हाथ कहाँ पहले जैसे रहे बेटा… उम्र हो गई है। कभी चीनी कम पड़ जाती है, कभी ज्यादा।”
उसे अचानक अपना बचपन याद आ गया। कितनी बार वह चाय पीकर कहता था— “माँ, आज चाय फीकी है।” कभी कहता— “आज चीनी बहुत ज्यादा है।” और माँ हर बार मुस्कराकर उसकी पसंद के अनुसार दूसरी चाय बना देती थी।
तब उसने कभी नहीं सोचा था कि जिस माँ के हाथ उसकी हर छोटी पसंद पहचानते थे, उन्हीं हाथों में भी एक दिन कंपन आ जाएगा।
उसने माँ को देखा। आज वह चाय बनाने में थक गई थी।वही माँ, जिसने उसके लिए न जाने कितनी रातें जागकर काटी थीं। वही माँ, जिसने उसकी हर जरूरत को अपनी जरूरत से पहले रखा था। वही माँ, जिसने उसके बड़े होने के लिए अपने कितने छोटे-बड़े सुख छोड़ दिए थे।
उसने माँ के चेहरे की ओर देखा। उम्र की लकीरों में उसे अपना पूरा बचपन दिखाई दे रहा था
और पहली बार उसे लगा—जिस माँ ने कभी उसको छोटी-सी असुविधा भी सहन नहीं होने दी, उसे उसने अपनी सुविधा के लिए वर्षों अकेला कैसे छोड़ दिया?
उसकी दृष्टि घर के उन सूने कमरों पर चली गई, जिनमें अब माँ की साँसों के अलावा कोई आवाज़ नहीं थी। उसे वह फोन पर कही बात याद आ रही थी— “लगता है, अब मुझे वृद्धाश्रम में ही रहना पड़ेगा…” उसने धीरे से कप नीचे रखा और माँ के काँपते हाथ अपने हाथों में ले लिए।
“माँ…” उसकी आवाज़ भर आई, “तुमने अपने जीवन की हर खुशी देकर मुझे इतना बड़ा किया… फिर तुम्हें अपने से दूर कैसे कर सकता हूँ?”
माँ चुपचाप उसे देखती रही। बेटे ने उसकी हथेलियाँ अपने हाथों में थामे रखीं।
“जिस तरह इस घर में तुमने अपना जीवन देकर मुझे सँवारा, अब उसी घर में तुम्हें अकेला नहीं रहने दूँगा। अब तुम्हें वृद्धाश्रम जाने की जरूरत नहीं है, माँ।”
माँ की आँखों से आँसू बह निकले। उसने बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए धीमे से कहा— “तेरे पिता भी तेरी राह देखते रहे बेटा… काश, उनका इंतज़ार भी तेरे आने पर खत्म हुआ होता।”
बेटे ने माँ की हथेली अपने माथे से लगा ली। उसकी आँखों से आँसू ढलक पड़े।
“हाँ माँ…” उसकी आवाज़ भर्रा गई, “देर तो बहुत कर दी।”
मेज़ पर रखी चाय अब ठंडी हो चुकी थी। वह देर तक उस ठंडी चाय को देखता रहा। उसे लगा— चाय ठंडी होने में कुछ ही पल लगे थे, लेकिन अपनों की प्रतीक्षा को ठंडा पड़ने में कभी-कभी पूरी उम्र लग जाती है।
— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”
