बालगीत – पों-पों पीं-पीं करती लारी
पों – पों पीं – पीं करती लारी।
ट्रक कारों के वाहन भारी।।
नहीं चैन से रहने देते।
कान फोड़ते वाहन जेते।।
शोर प्रदूषण की बीमारी।
पों – पों पीं – पीं करती लारी।।
मानक हो ध्वनि- विस्तारण का।
बनें निवारक अति वादन का।।
बने नहीं जन की लाचारी।
पों – पों पीं- पीं करती लारी।।
कानों की अपनी सीमा है।
नहीं अवधि का ध्वनि – बीमा है।।
कानों को ध्वनि लगती खारी।
पों-पों पीं-पीं करती लारी।।
ध्वनिज – स्वच्छता को अपनाएँ।
सेहत सजा सहज सुख पाएँ।।
करें जागरण होश सँवारी।
पों -पों पीं – पीं करती लारी।।
सभी स्वार्थ में खोए इतने।
परहित के मिलते हैं सपने।।
ध्वनि से गिरते महल अटारी।
पों – पों पीं – पीं करती लारी।।
— डॉ. भगवत स्वरूप ‘शुभम्’
