खुद को खोकर रिश्ते नहीं
अच्छा करके दुःख मिले, क्यों सहते हर बार।
जहाँ मिले केवल व्यथा, छोड़ो वह व्यवहार॥
सच्चाई का हर घड़ी, देना नहीं प्रमाण।
जिसको अच्छा लग रहा, उसमें देखो मान॥
मौन समझ कमजोरियां, ऐसे रखो विराम।
जहाँ न समझें भाव को, व्यर्थ न बोलो नाम॥
हर रिश्ते को ढो नहीं, होता सबका मोल।
जहाँ मिले बस पीर ही, बंद करो वह बोल॥
अपनी खातिर भी कभी, रखना अपना ध्यान।
खुद को खोकर मत करो, रिश्तों का सम्मान॥
उम्मीदों का भार भी, रख देना अब दूर।
जो अपना दुख दे रहा, उस सा ना है क्रूर॥
सीख मिले जो दर्द से, उसको रखना साथ।
आगे बढ़ना सीख लो, छोड़ो उनका हाथ॥
‘सौरभ’ खुद को खो नहीं, पाने की हो चाह।
स्वाभिमान जहाँ हो बचा, वह सच्ची है राह॥
रिश्ते वे ही श्रेष्ठ हैं, जिनमें प्रेम-विचार।
जोततुम्हें ही मिटा रहे, उनसे हो होशियार॥
— डॉ. सत्यवान सौरभ
