ग़ज़ल
सब मयस्सर हो जिसको घर बैठे ।।
काहिली क्यों न उसके सर बैठे ।।
मन की संवेदना हो तब जाग्रत
बात का दिल पे जब असर बैठे ।।
मशवरा है रखो नजर पे नजर
जाने किस शै पे जा नजर बैठै ।।
राय भी उस जगह पे दी जाए
बात का जिस जगह असर बैठे।।
फिर भी चाहत की है उन्हीं से उमींद
मेरी जानिब जो वेखबर बैठे ।।
दिल मिले जब करीबियां हों नितान्त
हम इधर बैठे वो उधर बैठे ।।
— समीर द्विवेदी नितान्त
