कविता

भारत

मातृभूमि के चरणों में वंदन अर्पित करती,
धड़कनें देश प्रेम में मग्न हो स्पंदन करती ।

प्रहरी पर्वतराज हिमालय नित रक्षा करता,
प्रांगण में नदियों का संगीत मधुरिम गूॅंजता,
पूरब-पश्चिम उत्तर-दक्षिण चहुॅं ओर भव्यता,
भारत की “आनंद” पुरातन गणमान्य सभ्यता,
परस्पर प्रीति की सौंधी खुशबू जहॉं महकती,
धड़कनें देश प्रेम में मग्न हो स्पंदन करती ।

भाषाओं में अनेकत्व मधु रस सौन्दर्य समाया,
तिंरगा देशभक्ति के गीत गाता ही लहराया,
मुसीबतों में हाथ थाम कर हौसला दिखाया,
विशाल जनतंत्र का स्वतंत्र सुंदर स्वराज पाया,
सकल विविधता में समरूपता नित जहॉं चहकती,
धड़कनें देश प्रेम में मग्न हो स्पंदन करती ।

कण-कण में जिसके खिलती नैसर्गिक सुंदरता,
रंग – बिरंगा पहनावा संस्कारों की शुभता,
रगों में वीरता हृदय में क्षमा की विशालता,
अलग-अलग धर्मों में पुष्पित होती मानवता,
पावन संस्कृतियॉं गर्वित हो सदा जहॉं हॅंसती,
धड़कनें देश प्रेम में मग्न हो स्पंदन करती ।

वीरता से जवान करें दुश्मनों का सामना,
मुस्कुराती विश्व बंधुत्व की नेह भावना,
जन-मन में पुष्पित परहित की प्रिय कामना,
करते सबका ही अभिनंदन और शुभकामना,
यशस्वी भारत की छवि हर दिल में जहॉं झलकती,
धड़कनें देश प्रेम में मग्न हो स्पंदन करती ।

— मोनिका डागा “आनंद”

*मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु

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