‘कच्चे धागे’ की ताकत
सन उन्नीस सौ तिहत्तर की है यह बात
नहीं भूलती अब भी वह कष्टकारी रात
‘कच्चे धागे’ फ़िल्म लगी थी मंडी कृष्णा टाकीज़ में
पहुंचे जब वहां देखा बेकाबू थे हालात
लाइन इतनी लंबी कि खिड़की तक पहुंचना था मुश्किल
कुछ लोग ब्लैक में बेच रहे थे टिकट
जैसे ही हम उन तक पहुंचे टिकट हो गए खत्म
पिक्चर तो देखनी थी समस्या खड़ी हो गई विकट
किसी तरह हम भी लाइन में हो गए खड़े
धीरे धीरे सरकते सरकते खिड़की तक पहुँचे हम
हमने भी पैसे मुट्ठी में डाल कर खिड़की में हाथ डाल दिया
भीड़ ने धक्का मारा फंस गया हाथ निकल रहा हो जैसे दम
हाथ फंस गया खिड़कीं में न अंदर जाए न बाहर
भीड़ के धक्के से उखड़ गए पांव दर्द से हम रहे थे कराह
पसीना पसीना हो रहे थे हवा में लटके हुए
हाथ बाहर निकालने के लिए हम पूरा जोर रहे थे लगा
बहुत देर के बाद टिकट मिला हाथ भी खिड़की से छूटा
बाल बिखरे हुए सूरत रोनी जैसे किसी ने हो बहुत पीटा
टिकट मिलते ही दोस्तो के चेहरे पर मुस्कुराहट छाई
मैं अधमरा सा हो गया था मानो किसी ने प्राण हो खींचा
पिक्चर मे कहाँ लगे दिल अब तो कलाई पर था ध्यान
कलाई के दर्द ने कर रखा था बहुत परेशान
दोस्त तो ले रहे थे ‘कच्चे धागे’ का आनंद
कलाई सूज गई थी मेरी तो निकल रही थी जान
होस्टल था हमारा गुरुद्वारे से थोड़ा आगे
पिक्चर देखकर हम होस्टल की तरफ थे भाग रहे
वापिस जब आये रात बारह बजे चुपके से गेट के पास
देखा जब तो होस्टल वार्डन और चौकीदार थे जाग रहे
होस्टल वार्डन ने की हम सब की बहुत धुनाई
डर के मारे मुंह से चूँ तक नहीं निकल पाई
तमाशा देखने खड़े हो गए आकर सारे
‘कच्चे धागे’ की ताकत उम्र भर के लिए खूब समझ आई
— रवींद्र कुमार शर्मा
