गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

न हम साया न कोई घर रहा है,
शजर से एक पत्ता गिर रहा है।

वो दुनया के लिए बेहतर रहा है,
जो मालिक ख़ुद कभी नौकर रहा है।

खंडर वो भी बहुत सुंदर रहा है,
जो बारिश में किसी का घर रहा है।

वो जिस धरती को सजदा कर रहा है,
कभी इस पर कोई मंदिर रहा है।

वो अब भी फ़िक्र उसकी कर रहा है,
किसी बस्ती में उसका घर रहा है।

मैं उसमें था मगर दिखता नहीं था,
कि इक लश्कर फ़क़त लश्कर रहा है।

जिसे है प्यार अपनी बेवा मां से,
वो बचपन से ही मेहनत कर रहा है।

फ़क़त सादा थी जिस लड़के की सूरत,
वही मां के लिए सुंदर रहा है।

उसी मजमे के अंदर मैं खड़ी हूं,
वो जिस जानिब इशारा कर रहा है।

नहीं पहचाना तू अब तक भी उसको,
कि जो नुक़सान तेरा कर रहा है।

किसी के प्यार का उत्तर न देकर,
कि तू ये जुर्म भारी कर रहा है।

फ़क़त तन्हा नहीं मरता है कोई,
किसी के साथ भी कुछ मर रहा है।

कई दिन तक नहीं निकला है घर से,
जो कुछ दिन के लिए बाहर रहा है।

ठहरता है गले पर हाथ अब भी,
बहुत दिन तक यहां ज़ेवर रहा है।

— अरुण शर्मा साहिबाबादी

अरुण शर्मा साहिबाबादी

नाम-अरुण कुमार शर्मा क़लमी नाम-अरुण शर्मा साहिबाबादी पिता -जगदीश दत्त शर्मा शिक्षा-एम ए उर्दू ,मुअल्लिम उर्दू ,बीटीसी उर्दू। जीविका उपार्जन- सरकारी शिक्षक पता-एफ़ 73, पहली मंज़िल,पटेल नगर-3, ग़ाज़ियाबाद। मोबाइल-9311281968 पुस्तकें-खोली, झुग्गी,पुल के नीचे एक पत्ती अभी हरी सी है, मुनफ़रिद,इजतिहाद.मुफ़ीक़ ( सभी कविता संग्रह) पुरुस्कार-उर्दूकी कई संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत। कई सम्मान समारोह आयोजित हुए हैं।

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