कविता

कुछ बातें

सत्तर तो बीत गये, इकहत्तर की तैयारी है,
जीवन बने मूल्यवान, सीखने की बारी है।

घड़ी का महत्व क्या, घड़ी ने समझा दिया,
पल- पल क़ीमती, पल भर में बता दिया।

मूल्यवान वक्त है, जो बीता वह चला गया,
वर्तमान ही सही है, गुज़रा वक्त बता गया।

समय को पकड़ने की चाह, जीवनभर करता रहा,
समय कब रोके रुका, सूखे रेत सा फिसलता रहा।

कब्र में पाँव लटके, अब दौर पुराना याद आया,
अनुभवों का मंथन किया, जीने का ख्याल आया।

शान से आये धरा पर, शान औ शौकत से जिये,
जब मरे तो सादगी से, दो गज कफ़न लिपट गये।

थी वही शमशान भूमि, कल फ़क़ीर जिस पर जला,
शहर ए रईस उसी जगह, जलने की ख़ातिर चला।

ढाई किलो अस्थियाँ, जलने पर बाकी रहें,
जिन्दगी भर लाखों टन, अहंकार ढोते रहे।

आज हूँ- कल था, परसों पुरातन हो जाऊँगा,
वक्त की बात है, वक्त के साथ खो जाऊँगा।

— डॉ. अ. कीर्तिवर्द्धन

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