नींव में जहर
कलम थमाई थी जिन हाथों में,
वो जात टटोलने निकले हैं,
किताबों के पन्नों को छोड़कर,
वो ऊंच नीच अब सीख रहे हैं,
अभी पंद्रह महीने ही तो बीते थे
इस विद्या के आंगन में,
मासूमों के कोमल मन में,
ये कौन सा ज़हर वो घोल रहे हैं?
हम कहां जा रहे हैं सोचो,
क्या नींव हम डाल रहे हैं?
भविष्य के इन निर्माताओं में,
कैसा अतीत हम ढाल रहे हैं?
जो ज्ञान की पावन वेदी थी,
वो भेद का अखाड़ा बन बैठी,
अक्षर सिखाने वाले से ही,
उसकी जाति पूछने आन खड़ी,
जिन्हें सिखाना था विज्ञान,
जिन्हें छूना था ऊंचा आसमान,
वो संकीर्ण गलियों में भटक रहे,
भूल कर इंसान की पहचान,
यह सवाल बच्चों का नहीं,
उनके घरों के सन्नाटे का है,
यह दोष उन मासूमों का नहीं,
इस बीमार समाज के ढांचे का है,
जागो ऐ मुल्क के रहबरों,
ये कैसी पीढ़ी तुम बना रहे हो?
प्रगति के ऊंचे दावों में,
देश को पीछे की ओर ढकेल रहे हो,
अगर शिक्षा की चौखट पर भी,
इंसान सिर्फ जाति से नापा जाएगा,
तो यकीन मानो इस देश का भविष्य,
अंधियारे में ही खो जाएगा,
अब भी वक्त है सम्भल जाओ,
इस खोखली सोच पर वार करो,
जाति नहीं,बस ज्ञान ही मजहब हो,
ऐसा नव-निर्माण करो।
— राजेन्द्र लाहिरी
