भाषा-साहित्य

राजभाषा हिंदी का  विरोध क्यों ?

भारत की “स्व“ भाषा हिंदी के लिए 14 सितंबर का दिन निर्धारित  किया गया है क्योंकि  इसी दिन भारत की संविधान सभा ने राष्ट्रीय भाषा के विषय पर व्यापक चर्चा  के बाद आधिकारिक भाषाओं में से एक के रूप में  हिंदी को अपनाया था। संविधान निर्माताओं ने देश की राजभाषा अनुच्छेद 343 में हिंदी को निर्धारित किया जो संविधान लागू होने के 15 वर्ष बाद अर्थात 26 जनवरी 1965 को देश की प्रथम राजभाषा हो जाएगी किंतु दुर्भाग्य वश 1965 में जब15 वर्ष पूर्ण  हुए तब तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने संविधान सभा की इच्छा के विपरीत गुलामी की मानसिकता की प्रतीक अंग्रेजी भाषा को ही औपचारिक भाषा घोषित कर दिया। तब से आज तक हिंदी भाषा के प्रति द्वेष का राजनैतिक विस्तार किया जाता रहा है।

संविधान के अनुच्छेद 343 में देश की राजभाषा हिंदी को निर्धारित किया गया था जिसे संविधान लागू होने के 15 वर्ष बाद अर्थात 26 जनवरी 1965 को देश की प्रथम राजभाषा के रूप में स्थापित किया जाना था। इसके  विस्तृत विवरण भाग- 17 में  इसकी लिपि देवनागरी निर्धारित है। अनुच्छेद -344 में राजभाषा के संबंध में आयोग और संसद की समिति के गठन की व्यवस्था दी गई है। संविधान में राजभाषा हिंदी के लिए पर्याप्त  विचार व व्यवस्थाएं दी गई हैं। संविधान में हिेंदी के साथ साथ  क्षेत्रीय भाषाओं  के विकास के लिए पर्याप्त व्यवस्था करी गई  किंतु कांग्रेस सरकारों  ने इन संविधान व्यवस्थाओं  को ईमानदारी के साथ लागू नहीं किया। यही कारण है कि आज  बहु स्वीकार्य भाषा होने के बाद भी हिंदी को संपूर्ण राजकीय सम्मान नहीं प्राप्त हो पा रहा है। 

स्वतंत्रता प्राप्ति के 80 वर्ष बाद भी संसद व कई राज्य विधानसभाओं के विधायी कार्य अंग्रेजी में ही संपन्न होते रहे। यद्यपि अटल बिहारी बाजपेई जैसे नेताओं ने हिंदी का ध्वज सदा थामे रखा और वर्तमान भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार में अधिकांश सांसद  व राज्य विधानसभाओें के विधायक हिंदी मे बोलते हुए दिखाई पड़ते  हैं तथा  संसद की कार्यवाही में हिंदी व क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग बढ़ा है। वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति भी हिंदी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। संविधान की आठवीं अनुसूची में हिंदी के अतिरिक्त भारत की 14 क्षेत्रीय भाषाओं का उल्लेख किया गया और देश की शैक्षिक एवं सांस्कृतिक उन्नति के लिए यह आवश्यक है कि इन सभी भाषाओं के पूर्ण व समन्वित विकास के हेतु केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा एक समन्वित  कार्यक्रम तैयार किया जाए। 

विचारणीय है कि यदि चीन, जापान,फ्रांस, इजराइल आदि देश अपनी भाषा में काम करते हुए विकास कर रहे हैं तो फिर भारत अपनी भाषा में काम करते हुए  विकास क्यों नहीं कर सकता? पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेयी ने हिंदी को संयुक्तराष्ट्र संघ की एक अधिकृत व मान्यता प्राप्त भाषा  बनाने का अभियान चलाया था, पूर्व विदेशमंत्री स्वर्गीय सुषमा स्वराज के कार्यकाल में भी यह अभियान गति पकड़ रहा था  किंतु वर्तमान में इसकी चर्चा नहीं हो रही है। वर्ष 1967 में पंडित दीन दयाल उपाध्याय तथा राम मनोहर लोहिया ने अंग्रेजी हटाओ आंदोलन चलाया  था । लाल बहादुर शास्त्री व सम्पूर्णानंद जी संस्कृत व हिंदी दोनों के ही पक्षधर थे। 

आज भी अंग्रेजी बोलने वाले हिंदी को राजभाषा बनाने व त्रिभाषा फार्मूला अपनाने का विरोध करते हैं। ये लोग स्वयं तो अंग्रेजियत के गुलाम हैं ही साथ ही देश के एक बड़े वर्ग को भी इतना प्रभावित करते हैं कि वो अंग्रेजी के कुछ शब्द सीखकर ही गौरवान्वित अनुभव करने लगता है। अंग्रेजी के इन गुलामों ने ऐसी अपसंस्कृति को बढ़ावा दिया है जिसमें घरों के अन्दर जहाँ  माता- पिता हिंदी व क्षेत्रीय भाषा बोल सकते हैं वो भी टमाटर को टोमैटो, चावल को राइस और केले को बनाना कहते हैं । हिंदी में गिनती बोलना भूल गए हैं। परिवार में बालक -बालिकाएं अपनी बुआ, चाची व मौसी सभी को एक ही संबोधन आंटी तथा चाचा, फूफा आदि को अंकल कहते  हैं । लोग अपने बच्चों को उधार और ऋण लेकर महंगे अंग्रेजी विद्यालयों में  प्रवेश दिलवा रहे हैं। 

हिंदी भाषी जनता व नेताओं  ने कभी भी किसी अन्य भाषा का विरोध नहीं किया बल्कि उन्हें सम्मान दिया और  सीखने का प्रयास किया इसके इतर अन्य भाषा भाषियों ने सदा से ही हिंदी के प्रति द्वेष रखा। कन्नड़ सिनेमा के सुपर स्टार  शिवराजकुमार ने अपनी नयी फिल्म के एक कार्यक्रम में हिंदी को राष्ट्रीय भाषा कह दिया तो कुछ लोग उनके पीछे पड़ गए और  बड़ा भाषा विवाद उत्पन्न कर दिया गया अंततः अभिनेता शिवराजकुमार को सफाई देनी पड़ी। 

हिंदी की स्थिति में सुधार के लिए सभी को हिंदी का आग्रही बनना होगा। अपने हस्ताक्षर हिंदी में करें ।अपने घरों तथा परिवार में साधारण आम बोलचाल की हिंदी भाषा में ही बात करें ।  पारिवारिक उत्सवों के आमंत्रण हिंदी में छपवाएँ। ऐसे छोटे छोटे सरल प्रयास भी हिंदी को आगे बढ़ाने में सक्षम हैं।

— मृत्युंजय दीक्षित 

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