कविता

हवा कवियों से मिलने जा रही है

मैंने हवा से पूछा-
हे हवा !
तुम चल रही हो
अनवरत आगे बढ़ रही हो
बिना रुके
कोई थकावट नहीं
बिना डरे हुए
हर मुकाबला करने के लिए
मुस्कराते हुए
जाबांज सिपाही की तरह
हैरान सी भी नहीं लगती हो
ताजगी से भरी हो
मस्तक पर भी चमक है
हारी सी भी नहीं लग रही हो
इतनी उर्जा लिए
सुबह-सुबह किधर जा रही हो
हरी-हरी चुड़ियाँ पहने
लाल-लाल साड़ियां पहने
सोलह श्रृंगार किये हुए
अब रात हो गयी है
आखिर चांदनी रात में
किससे मिलने जा रही हो
हवा बोली-
मै कवियों से मिलने जा रही हूँ
फूलों का हार पहनाना चाहती हूँ
ये कवि सोते समाज को जगाते हैं
मैं उनको प्रणाम करने जा रही हूँ

— जयचन्द प्रजापति ‘जय’

*जयचन्द प्रजापति

प्रयागराज मो.7880438226 jaychand4455@gmail.com

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