गीत/नवगीत

नेपाल की पीड़ा

धरती डूबी पर्वत कांपे, रोया सकल जहान है।
मलबे में सब स्वप्न दब गए, सूने हुए मकान हैं।

चीखों से काँपा है अंबर, सहमा सारा गाँव नगर।
माँ की सूनी आँखें ढूंढें , कहाँ मिले अब ठाँव मगर ।
डूब गए घर,आँगन उजड़े, बिखरे सब अरमान हैं।
धरती डूबी पर्वत कांपे, रोया सकल जहान है।

क्यों कर छीनी हँसी सुनहरी, क्यों छीने हैं प्राण यहाँ।
किसके घर का दीप बुझा है, कौन हुआ वीरान यहाँ।
पत्थर बनकर खड़ी नियति ने, छीना सुख- सम्मान है ।
धरती डूबी पर्वत कांपे, रोया सकल जहान है।

फिर भी राख तले उम्मीदें, खोज रहा है साथ बड़ा ।
टूटे मन को थाम रहा है, मानवता का हाथ खड़ा।
दुःख की इस घनघोर घड़ी में, प्रेम बने पहचान है।
धरती डूबी पर्वत कांपे, रोया सकल जहान है।

सीमा केवल मानचित्र की, मानव एक समान सदा।
दुख में जो आँसू पोंछे, वह ही सच्चा इंसान सदा।
आओ मिलकर घाव भरें हम, रहे नहीं अंजान हैं ।
धरती डूबी पर्वत कांपे, रोया सकल जहान है।

फिर से हँसे हिमालय की यह, घायल धरती बेबस आज।
हो सुरम्य वातायन सारा, घर- घर साजे मंगल साज।
नव आशा के अंकुर फूटें , विकसित नया विहान है।
धरती डूबी पर्वत कांपे, रोया सकल जहान है।

— मंजूषा श्रीवास्तव ‘मृदुल’

*मंजूषा श्रीवास्तव

शिक्षा : एम. ए (हिन्दी) बी .एड पति : श्री लवलेश कुमार श्रीवास्तव साहित्यिक उपलब्धि : उड़ान (साझा संग्रह), संदल सुगंध (साझा काव्य संग्रह ), गज़ल गंगा (साझा संग्रह ) रेवान्त (त्रैमासिक पत्रिका) नवभारत टाइम्स , स्वतंत्र भारत , नवजीवन इत्यादि समाचार पत्रों में रचनाओं प्रकाशित पता : 12/75 इंदिरा नगर , लखनऊ (यू. पी ) पिन कोड - 226016