स्वास्थ्य

मौसम बदलने पर स्वास्थ्य बनाये रखना

आजकल लोगों में जीवनी शक्ति का बहुत अभाव पाया जाता है। इतना कि जरा सा मौसम बदलने पर भी वे बीमार पड़ जाते हैं और इसे स्वाभाविक बात मानकर मौसम को ही अपनी बीमारी का कारण बताते हैं। परन्तु मौसम तो सभी के लिए बदलता है। यदि मौसम ही बीमारियों का कारण होता, तो सभी लोग बीमार पड़ जाते। इसलिए अपनी बीमारियों के लिए मौसम को दोष देना सही नहीं है। कई लोग पहले से ही डरे रहते हैं कि अब मौसम बदलने वाला है, तो बीमार पड़ना ही है। वास्तव में मौसम का बदलना नहीं, बल्कि जीवनी शक्ति की कमजोरी ही उनके बीमार पड़ने का प्रमुख कारण होती है।

इसी जीवनी शक्ति को बोल-चाल में ‘रोग प्रतिरोधक क्षमता’ कहा जाता है, अंग्रेजी में ‘इम्यूनिटी’। जब यह रोग प्रतिरोधक क्षमता किसी व्यक्ति में कम होती है, तो वह मौसम के जरा से बदलाव को भी सहन नहीं कर पाता और बीमार पड़ जाता है। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि मौसम बदलने पर हम बीमार न पड़ें तो हमें अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यूनिटी को मजबूत बनाना होगा। जिन लोगों की इम्यूनिटी सुदृढ़ होती है, उन पर मौसम के बदलने का कोई प्रभाव नहीं पड़ता और वे हम प्रकार के मौसम को झेल जाते हैं।

रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने के कई कारण होते हैं। उनमें सबसे पहला है- अनुचित खान-पान और दूसरा है- मौसम के विपरीत चलना। हम स्वाद या चलन के वशीभूत होकर मनमानी चीजें खाते-पीते रहते हैं, जैसे पिज्जा, बर्गर, पेट्टीज, छोले-कुलचे, छोले-भटूरे आदि फास्ट-फूड या भारी-भारी वस्तुएँ, जिनको हमारा शरीर सरलता से पचा नहीं सकता या स्वीकार नहीं कर पाता। उनको पचाने और उनका अधिकांश अनावश्यक भाग शरीर से बाहर निकालने में हमारी बहुत सी रोग प्रतिरोधक क्षमता या जीवनी शक्ति खर्च हो जाती है।

इसी प्रकार हम जाड़ों में हीटर के सामने बैठे रहते हैं या गर्म कपड़ों से लदे रहते हैं, गर्मियों में कूलर और एयरकंडीशनर वाले कमरों में बैठे रहते हैं तथा बरसात के दिनों में घर में घुसे रहते हैं। इससे हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता निर्बल हो जाती है और हमारा शरीर मौसम के थोड़े से परिवर्तन को भी झेलने में असमर्थ हो जाता है।

स्वस्थ रहने और अपनी जीवनी शक्ति को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि हम मौसम के साथ-साथ चलें अर्थात् जहाँ तक हो सके जाड़ों में जाड़ा सहन करें, गर्मियों में गर्मी सहन करें और कभी-कभी बरसात में भीगें भी। मौसम अपनी सहन-शक्ति से बाहर होने पर ही हमें कृत्रिम उपायों जैसे जाड़ों में हीटर पर तापना, गर्मियों में कूलर या एसी और बरसात में रेनकोट या छाता का सहारा लेना चाहिए।

जिन लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है, उनके ऊपर कोई भी बीमारी और महामारी भी कोई प्रभाव नहीं डाल सकती। यह देखा गया है कि कोरोना महामारी के समय भी बहुत से लोग इस रोग से बचे रहे या यह रोग उनको केवल छूकर निकल गया। इसका कारण यही रहा होगा कि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत मजबूत थी।

यदि आप वर्तमान मौसम के साथ-साथ चलेंगे, तो अगले मौसम और उसमें उत्पन्न होने या फैलने वाली बीमारियों का सामना करने की शक्ति आपके शरीर में स्वतः उत्पन्न हो जाएगी। इसके अलावा अपने शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए कुछ सहायक उपाय भी अपनाये जा सकते हैं, जैसे-

  1. प्रातः उठते ही एक गिलास सादा या गुनगुने पानी में आधा नींबू निचोड़कर और एक चम्मच शुद्ध शहद मिलाकर पीना।
  2. लहसुन की नित्य तीन-चार कली छीलकर और छोटे छोटे टुकड़े करके कच्चे ही पानी के साथ निगल लेना।
  3. रात्रि को सोते समय एक चम्मच त्रिफला चूर्ण सादा या गुनगुने पानी के साथ फाँक लेना।
  4. अपने भोजन में सलाद के साथ एकाध हरी मिर्च कच्ची ही खाना।
    इन सभी उपायों से शरीर में रोगों से लड़ने की शक्ति अर्थात् रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत बढ जाती है और पुराने रोग भी ठीक हो जाते हैं।

— डॉ. विजय कुमार सिंघल
भाद्रपद कृ. 8, सं. 2083 वि. (3 अक्टूबर 2026)

डॉ. विजय कुमार सिंघल

नाम - डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’ जन्म तिथि - 27 अक्तूबर, 1959 जन्म स्थान - गाँव - दघेंटा, विकास खंड - बल्देव, जिला - मथुरा (उ.प्र.) पिता - स्व. श्री छेदा लाल अग्रवाल माता - स्व. श्रीमती शीला देवी पितामह - स्व. श्री चिन्तामणि जी सिंघल ज्येष्ठ पितामह - स्व. स्वामी शंकरानन्द सरस्वती जी महाराज शिक्षा - एम.स्टेट., एम.फिल. (कम्प्यूटर विज्ञान), सीएआईआईबी पुरस्कार - जापान के एक सरकारी संस्थान द्वारा कम्प्यूटरीकरण विषय पर आयोजित विश्व-स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में विजयी होने पर पुरस्कार ग्रहण करने हेतु जापान यात्रा, जहाँ गोल्ड कप द्वारा सम्मानित। इसके अतिरिक्त अनेक निबंध प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत। आजीविका - इलाहाबाद बैंक, डीआरएस, मंडलीय कार्यालय, लखनऊ में मुख्य प्रबंधक (सूचना प्रौद्योगिकी) के पद से अवकाशप्राप्त। लेखन - कम्प्यूटर से सम्बंधित विषयों पर 80 पुस्तकें लिखित, जिनमें से 75 प्रकाशित। अन्य प्रकाशित पुस्तकें- वैदिक गीता, सरस भजन संग्रह, स्वास्थ्य रहस्य। अनेक लेख, कविताएँ, कहानियाँ, व्यंग्य, कार्टून आदि यत्र-तत्र प्रकाशित। महाभारत पर आधारित लघु उपन्यास ‘शान्तिदूत’ वेबसाइट पर प्रकाशित। आत्मकथा - प्रथम भाग (मुर्गे की तीसरी टाँग), द्वितीय भाग (दो नम्बर का आदमी) एवं तृतीय भाग (एक नजर पीछे की ओर) प्रकाशित। आत्मकथा का चतुर्थ भाग (महाशून्य की ओर) प्रकाशनाधीन। प्रकाशन- वेब पत्रिका ‘जय विजय’ मासिक का नियमित सम्पादन एवं प्रकाशन, वेबसाइट- www.jayvijay.co, ई-मेल: jayvijaymail@gmail.com, प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य सम्पर्क सूत्र - 15, सरयू विहार फेज 2, निकट बसन्त विहार, कमला नगर, आगरा-282005 (उप्र), मो. 9919997596, ई-मेल- vijayks@rediffmail.com, vijaysinghal27@gmail.com

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