चुगने लगी कपास
रोटी दे बछड़ा पला, खूब सिखाई पींग।
बड़ा हुआ तो मारता, आज मुझे ही सींग॥
दाना चिड़िया को दिया, भरा पंख उल्लास।
उड़कर मेरे खेत में, चुगने लगी कपास॥
दूध पिलाया साँप को, समझा अपना यार।
बड़ा हुआ तो डस गया, भूल गया उपकार॥
संकट में थामा जिसे, वही बना तलवार।
अपनों के ही घाव से, छलनी हुआ विचार॥
जिसको दी थी छाँव तब, वह काटे वही दरख़्त।
मतलब निकला काम का, आज पलटते तख़्त॥
जिसके खातिर लड़ पड़े, दुनिया से दिन-रात।
वही पीठ में घोंपता, मौका पाकर घात॥
जिनको हमने पँख दिए, उड़ने को आकाश।
वही लौटकर नोचते, अपना ही विश्वास॥
नेकी का बदला मिला, ताने और लगाम।
आजकल एहसान भी, बन जाता इल्ज़ाम॥
जिसको अपना मानकर, खोले मन के द्वार।
वही खबर बाजार में, बेच रहा हर बार॥
जिसको समझा दूध-सा, निकला विषदंत।
अपनों के ही वार से, टूटे मन के कंत॥
— डॉ. सत्यवान सौरभ
