बाल पद्य कथा – पुड़ियाँ चार
वैद्यराज ने बीमारी में,
मुझको दी थीं पुड़ियाँ चार
पुड़ियों में था लाल रंग का,
एक कसैला चूरन सा
खाना पड़ा मुझे वह चूरन,
लेकिन अभी नहीं मन था
आखिर क्यों न खाता मैं वह,
पड़ा हुआ था मैं बीमार
तीन -तीन घंटे में खाना,
मुझको मिली हिदायत थी
पानी नहीं बाद में पीना,
पतली मेरी हालत थी
बात बड़ों ने की थी इससे,
करना पड़ा मुझे स्वीकार
लेकिन इन चारों पुड़ियों में,
छुपा हुआ था सच, जादू
पुड़ियों ने था बीमारी को,
किया फटाफट ही काबू
दिवस दूसरे दौड़ लगाकर,
जा पहुंचा था मैं बाज़ार
आयुर्वेदिक का इलाज तो,
सच में बड़ा पुराना है
मेरे दादाजी का इससे,
तो पक्का याराना है
यही दवाएं बीमारी से,
करतीं थीं सबका उद्धार
शुद्ध हवा, जल शुद्ध साथ में,
भोजन बिलकुल सादा हो
भोर भ्रमण का रोज नियम से,
जिसका रहा इरादा हो
बिना मांग के उसको मिलता
खुशियाँ भरा हुआ संसार
— प्रभुदयाल श्रीवास्तव
