मुक्तक/दोहा

नारी खुद इतिहास

अबला कहकर मत दबो, नारी है तलवार।
हक़ की खातिर उठ खड़ी, करती सीधा वार॥

आँसू कमजोरी समझ, मत करना व्यवहार।
बूँद-बूँद जब आग हो, बदले ये संसार॥

चूल्हे तक सीमित नहीं, नारी का संसार।
आसमान को छू रही, लेकर नया विचार॥

जिसने घर को थामकर, सँवारा हर परिवार।
उसके हिस्से क्यों रहे, केवल दु:ख-उधार॥

पायल की झंकार में, छिपा हुआ हुंकार।
नारी जब आवाज़ दे, काँपे अत्याचार॥

बेटी को अवसर मिले, तो बदले परिवार।
शिक्षा देकर देखिए, रोशन हो संसार॥

बेटी बोझ नहीं कभी, बेटी है उपहार।
उसके सपनों को मिले, उड़ने का अधिकार॥

नारी केवल देह ना, नारी है विचार।
उसकी खुद पहचान है, अपना है संसार॥

बाँध न पाएँगे उसे, रस्मों की दीवार।
अपने पथ पर चल पड़े, कुचले सब अंगार॥

सदियों से जो सह गई, अब न सहना भार।
नारी जागी तो हुआ, सच का नया प्रचार॥

जिस घर में सम्मान हो, नारी का हर बार।
उस घर में खुशियाँ रहें, जैसे फूल हजार॥

हाथों में जब कलम हो, आँखों में अधिकार।
नारी खुद इतिहास फिर, लिखती बारंबार॥

डर की चादर फाड़कर, निकली लेकर धार।
अन्यायों के सामने, नारी बनी अंगार॥

रोटी, कपड़ा, घर नहीं, सपनों का अधिकार।
नारी को भी चाहिए, खुला एक संसार॥

मौन रही तो सह गई, बोली तो ललकार।
नारी की आवाज़ में, छिपा नया संसार॥

नारी को कमजोर कह, मत करना अभिमान।
वक्त पड़े तो वह बने, संकट में चट्टान॥

फूल नहीं अंगार है, नारी का अधिकार।
चलना उसको है स्वयं, अपने पथ हर बार॥

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh

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