रेलवे स्टेशन
भीषण गर्मी की वह दोपहर थी। अपने शहर के छोटे-से रेलवे स्टेशन तक पहुँचते-पहुँचते ऐसा लगने लगा था, जैसे सूरज को मेरे ही सिर पर अपना सारा हिसाब चुकाना हो। सड़क से उठती तपिश जूतों के तलवों में घुस रही थी और माथे का पसीना आँखों तक उतर आया था। स्टेशन के बाहर खड़े नीम की छाया में दो कुत्ते पसरे हुए थे। उनमें से एक ने मुझे देखा, गर्दन उठाई और फिर रख दी—इस मौसम में किसी आने-जाने वाले में दिलचस्पी लेना भी अतिरिक्त श्रम था।
प्लेटफॉर्म पर कदम रखते ही मैंने आदतन जेब से मोबाइल निकाला। स्क्रीन काली थी। बटन दबाया, कुछ देर दबाए रखा, फिर दोबारा दबाया; जैसे आग्रह बढ़ाने से उसमें थोड़ी जान लौट आएगी। सुबह से बैटरी कम होने की चेतावनी आ रही थी, लेकिन मुझे विश्वास था कि अभी चल जाएगा। आखिर वह भी बंद हो गया था। बैग की छोटी जेब टटोली तो याद आया—चार्जर घर पर ही रह गया है।
एक क्षण को बड़ी खीज हुई। ट्रेन आने में अभी समय था। अब क्या करूँगा?
मोबाइल वापस जेब में रखकर मैंने सामने देखा।
प्लेटफॉर्म की पुरानी दीवार का पलस्तर कई जगह से झड़ गया था। नीचे से निकली ईंटें धूप में कुछ और लाल दिखाई देती थीं। छत से लटका एक पंखा घूम रहा था, लेकिन उसके नीचे बैठे लोग अपने रुमाल और अखबार भी चला रहे थे। पंखे की हर परिक्रमा के साथ एक खट-खट सुनाई देती थी। पास ही नल से पतली धार गिर रही थी। एक आदमी बोतल भरते समय उसके मुँह को बार-बार ठीक जगह लगाता, फिर हथेली में पानी लेकर अपनी गर्दन भिगो लेता।
मैं छाया में पड़ी एक बेंच पर बैठ गया। कुछ देर तक मन जेब में रखे उस बंद मोबाइल के आसपास ही मंडराता रहा। फिर धीरे-धीरे स्टेशन की आवाजें स्पष्ट होने लगीं। चाय वाले की पुकार, कहीं किसी बच्चे का रोना, बोतल गिरने की खनक, दूर से आती रेल की धड़धड़ाहट—जिसे सुनकर दो यात्री उठे और मालगाड़ी देखकर फिर बैठ गए। इन सबके बीच एक कबूतर छत की कड़ी पर बैठा अपनी गर्दन हिला रहा था।
मेरे सामने एक स्त्री कपड़े की गठरी पर बैठी थी। उसके पास पाँच-छह बरस का बच्चा था, जिसकी कमीज का एक बटन टूटा हुआ था और पैरों की चप्पलें आपस में मेल नहीं खाती थीं। वह प्लेटफॉर्म पर बनी सफेद लकीर पर चलने का अभ्यास कर रहा था। दोनों हाथ फैलाकर कुछ कदम चलता, संतुलन बिगड़ते ही नीचे उतर जाता और फिर पीछे लौटकर वहीं से शुरू करता। उसकी माँ बीच-बीच में कहती, “दूर मत जाना,” और वह बिना उसकी ओर देखे जवाब देता, “यहीं तो हूँ!”
एक बार उसने झुककर पटरियों के बीच पड़े पत्थरों को देखा और पूछा, “अम्मा, इतने सारे पत्थर किसने डाले?”
माँ ने अपनी गठरी की गाँठ कसते हुए कहा, “रेल वालों ने।”
“रेल वाले खेलते हैं इनसे?”
माँ मुस्करा दी। वह उत्तर की प्रतीक्षा में कुछ देर खड़ा रहा, फिर उसे प्लेटफॉर्म पर एक छोटा-सा कंकड़ मिल गया। अब उसकी जिज्ञासा का समाधान चाहे न हुआ हो, खेलने की व्यवस्था हो गई थी।
माँ ने कागज में लिपटा समोसा निकाला। बच्चा तुरंत उसके पास पहुँचा, समोसा लिया और थोड़ी दूरी पर बैठ गया। वह ठंडा हो चुका था; उसकी सतह पर तेल के गहरे धब्बे थे। बच्चे ने पहला कौर लिया तो आलू का थोड़ा हिस्सा नीचे गिर गया। उसने उसे उठाया, फूँक मारी और खा लिया। फिर समोसे के खुले हिस्से में झाँककर कुछ देर देखा, मानो अगला कौर कहाँ से लिया जाए, यह एक जरूरी निर्णय हो।
उसके चेहरे पर ऐसी तृप्ति थी कि मैं उसे देखता रह गया। बचपन में मेले से लौटते हुए कागज में मिला गरम कचौड़ी का टुकड़ा याद आ गया। पिता चलते रहते थे और मैं उनके पीछे खाने में इतना मग्न चलता कि बीच-बीच में उनकी उँगली छूट जाती। तब किसी स्वाद को अच्छा लगने के लिए उसके बारे में कुछ जानना आवश्यक नहीं था।
बेंच के दूसरे सिरे पर बैठे वृद्ध ने अपनी छड़ी उठाकर थोड़ा खिसकने की कोशिश की। मैंने उनका थैला अपनी ओर कर दिया तो वे आराम से बैठ गए। सफेद कुरते की जेब से टिकट का कोना बाहर निकला हुआ था। उन्होंने उसे निकाला, देखा और फिर भीतर रख लिया।
“इसी प्लेटफार्म से गाड़ी जाएगी न?” उन्होंने मुझसे पूछा।
मैंने सिर हिलाया। कुछ देर बाद उन्होंने बताया कि बेटे के यहाँ जा रहे हैं। बात करते समय उनके चेहरे पर कोई विशेष उत्साह नहीं था, लेकिन जब प्लेटफॉर्म पर घोषणा हुई तो वे सबसे पहले सीधे होकर बैठे। अपनी छड़ी के सिरे को जमीन पर टिकाकर उन्होंने दूर पटरियों की ओर देखना शुरू कर दिया।
उसी समय एक दुबला-पतला भिखारी हमारे सामने आकर रुका। एक पैर कुछ घिसटता हुआ चलता था। उसने हथेली फैलाई और धीमे स्वर में कुछ कहा। बगल में खड़े भारी शरीर वाले सज्जन ने, जिनकी उँगलियों में दो चमकती अँगूठियाँ थीं, पहले उसे ऊपर से नीचे तक देखा, फिर अपने बैग को थोड़ा पीछे खींच लिया।
“काम क्यों नहीं करते?” उन्होंने पूछा।
वह आदमी कुछ बोला, लेकिन स्टेशन के शोर में उसकी बात स्पष्ट नहीं हुई। सज्जन ने हाथ से आगे बढ़ने का संकेत किया और पानी की नई बोतल खोल ली।
भिखारी कुछ कदम आगे जाकर उसी बच्चे के पास रुका। बच्चे ने उसकी हथेली देखी, फिर अपने समोसे को। माँ की ओर एक बार नजर उठाई और बचा हुआ टुकड़ा उसकी ओर बढ़ा दिया।
“ले लो।”
आदमी ने झुककर टुकड़ा लिया। बच्चे की माँ ने बस इतना कहा, “अब फिर मत माँगना।”
बच्चे ने अपने तेल लगे हाथ कमीज पर पोंछ लिए और कंकड़ उठाकर खेलने लगा। मैं उस आदमी को धीरे-धीरे आगे जाते देखता रहा। मन में कुछ आया, लेकिन तब तक ट्रेन का घंटा बज उठा था और प्लेटफॉर्म का सारा ध्यान एक दिशा में मुड़ गया।
अभी तक जो लोग गर्मी से पस्त बैठे थे, वे अचानक उठ खड़े हुए। गठरियाँ कंधों पर आईं, थैले सँभाले गए, बच्चों की कलाइयाँ पकड़ ली गईं। चाय वाले ने अपने गिलास जल्दी-जल्दी समेटे। वृद्ध ने छड़ी पर भार देकर उठने की कोशिश की तो मैंने उनका थैला उठा लिया। उन्होंने पहले मना किया, फिर चुपचाप मेरे साथ चल दिए।
लोकल पैसेंजर ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म पर आ रही थी। उसके पहियों की आवाज पास आते-आते इतनी भर गई कि कुछ क्षण पहले तक सुनाई देने वाली सारी छोटी आवाजें उसमें दब गईं। खिड़कियों से झाँकते चेहरे दिखाई दिए; कोई उतरने के लिए दरवाजे पर खड़ा था, कोई भीतर से जगह पूछ रहा था। ट्रेन पूरी तरह रुकी भी नहीं थी कि एक आदमी ने अपनी चप्पल दरवाजे की सीढ़ियों पर रख दी। पीछे से किसी ने टोका, “अरे, रुक तो जाने दो!”
दरवाजे के पास एक युवा स्त्री अपने छोटे बच्चे और दो थैलों के साथ खड़ी थी। वह कभी डिब्बे का नंबर देखती, कभी भीतर की भीड़। बच्चे की निगाह इंजन की ओर थी।
“मम्मी, इसमें बैठेंगे?”
“हाँ, पहले चढ़ने तो दे।”
उसने एक थैला दरवाजे के भीतर रखा, फिर बच्चे को ऊपर चढ़ाया। भीतर से किसी ने उसका दूसरा थैला पकड़ लिया। बच्चा चढ़ते ही मुड़ा और उत्साहित होकर बोला, “मम्मी, इसमें तो घर जैसी सीटें हैं!”
स्त्री की घबराहट में भी हँसी की एक छोटी-सी रेखा उभरी।
मैंने वृद्ध का थैला भीतर रख दिया। एक युवक ने उठकर उन्हें अपनी जगह दे दी। मैं पास की खिड़की वाली सीट पर बैठ गया। मेरा गंतव्य केवल बीस किलोमीटर दूर था—यहाँ से तीसरा स्टेशन। इतना छोटा सफर कि सामान्य दिनों में दो-चार संदेश पढ़ते, एक वीडियो देखते और उतरने की तैयारी करने लगता।
सामने की सीट पर एक आदमी ने अपना रुमाल फैलाकर जगह रोक रखी थी। साथ वाला यात्री बैठने लगा तो उसने कहा, “यहाँ आदमी आ रहा है।”
“कहाँ है?”
उसने दरवाजे की ओर देखा। जिस आदमी के आने की उम्मीद थी, वह दिखाई नहीं दिया। थोड़ी देर बाद उसने रुमाल उठा लिया और दोनों अपनी-अपनी जाँघें समेटकर बैठ गए। बैठते समय वे असंतुष्ट थे; पाँच मिनट बाद गर्मी और ट्रेन की देरी पर एकमत हो चुके थे।
ऊपर का पंखा तेज आवाज के साथ चल रहा था। एक पंखे के बीच में किसी पुराने विज्ञापन का फटा कागज अटका हुआ था, जो घूमते समय काँप रहा था। डिब्बे में पसीने, लोहे और किसी के खुले टिफिन में रखे अचार की मिली-जुली गंध थी। एक युवक दरवाजे के पास खड़ा मोबाइल पर बोल रहा था, “हाँ, बैठ गया हूँ,” और सामने बैठे आदमी ने उसकी ओर देखकर मुस्करा दिया।
ट्रेन चली तो पहले एक खिंचाव-सा हुआ। खिड़की के बाहर प्लेटफॉर्म धीरे-धीरे सरकने लगा। वही बेंच, वही नल, चाय वाले का ठेला, दीवार पर लगा उखड़ा पोस्टर—सब पीछे जाने लगे। समोसा खाने वाला बच्चा अपनी माँ के साथ दूसरी खिड़की पर बैठा दिखाई दिया। मुझे देखकर उसने हाथ उठाया। मैंने भी हाथ हिलाया।
स्टेशन की आखिरी छत पीछे छूटी तो हवा सीधे चेहरे पर लगी। गर्म थी, फिर भी उसमें एक खुलापन था। मैंने कमीज का ऊपरी बटन ढीला किया और बाहर देखने लगा।
पहले शहर के पिछवाड़े दिखाई दिए—छोटी छतें, रस्सियों पर सूखते कपड़े, एक आँगन में उलटी रखी चारपाई, दीवार के पास खड़ी साइकिल। एक स्त्री छत पर पापड़ समेट रही थी। ट्रेन की आवाज पर उसने सिर उठाया, फिर अपनी थाली सँभालने लगी। पास की गली में दो लड़के साइकिल दौड़ा रहे थे। एक ने ट्रेन को हाथ दिखाया और दूसरे को पीछे छोड़ने की कोशिश में और जोर से पैडल मारने लगा।
फिर मकान विरल होने लगे। खुली जमीन आई, झाड़ियाँ आईं और उसके बाद खेत।
दोपहर की धूप में सब कुछ हरा नहीं था। कहीं कटे खेतों की मिट्टी खुली पड़ी थी, कहीं सूखी मेड़ों पर पीली घास थी। दूर कुछ पेड़ इतने स्थिर खड़े थे कि उनके नीचे की छाया भी ठहरी हुई लगती थी। अचानक एक खेत में हरी फसल दिखाई दी। हवा चली तो उसकी सतह पर एक हल्की लहर उठी और दूसरे छोर तक चली गई। मैंने गर्दन थोड़ा बाहर की ओर की, ताकि वह दृश्य कुछ देर और दिखता रहे।
“टिकट।”
आवाज सुनकर मैं भीतर लौटा। टिकट निरीक्षक सामने खड़ा था। काले कोट के नीचे उसकी कमीज गर्दन पर पसीने से भीगी हुई थी। मैंने जेब से टिकट निकालकर दिया। उसने देखा, लौटाया और आगे बढ़ गया। युवा स्त्री अपना टिकट खोजते हुए परेशान हो गई। उसने थैला खोला, छोटी जेब टटोली, फिर बच्चे से कहा, “वो कागज कहाँ रखा था?”
बच्चे ने बड़े विश्वास से अपनी निकर की जेब में हाथ डाला और टिकट निकाल दिया। टिकट के साथ एक टॉफी का खाली कागज और नीला प्लास्टिक का छोटा पहिया भी निकला।
“मुझे दे देते, तो खोता नहीं,” उसने कहा।
आसपास बैठे लोग हँस पड़े। स्त्री ने टिकट निरीक्षक को टिकट देते हुए बच्चे की ओर देखा। अब उसके चेहरे से चढ़ते समय की घबराहट काफी उतर चुकी थी।
कुछ देर बाद वही बच्चा खिड़की के पास आ गया। उसकी माँ ने उसे अपने घुटनों पर बैठा लिया। बाहर देखकर उसने पूछा, “मम्मी, पेड़ पीछे क्यों भाग रहे हैं?”
“हम चल रहे हैं, बेटा।”
उसने नीचे पटरी की ओर देखने की कोशिश की, फिर दूर खड़े पेड़ों की ओर। उसे माँ का उत्तर शायद पूरी तरह स्वीकार नहीं हुआ।
“वो बड़ा वाला नहीं भाग रहा। छोटे वाले भाग रहे हैं।”
मैं मुस्करा दिया। पास की झाड़ियाँ सचमुच तेजी से निकल रही थीं और दूर का बरगद देर तक हमारे साथ बना हुआ था। बच्चे की आँखों से देखते ही परिचित दृश्य में एक नया खेल खुल गया।
अगले छोटे स्टेशन पर ट्रेन रुकी। प्लेटफॉर्म बहुत नीचा था। एक आदमी सिर पर टोकरी लिए चढ़ा और उसने खीरे बेचने शुरू कर दिए। सामने बैठे यात्री ने दो खीरे लिए, एक साथ वाले आदमी को दिया—उसी को, जिसके बैठने पर कुछ देर पहले आपत्ति थी। दोनों अब नमक की पुड़िया सँभालते हुए बातें कर रहे थे।
खिड़की के बाहर स्टेशन की बेंच पर एक बूढ़ी स्त्री बैठी थी। उसके पैरों के पास पीतल का छोटा लोटा रखा था। उसने ट्रेन के भीतर देर तक देखा। फिर एक युवक दरवाजे से उतरा और उसके पास पहुँच गया। बूढ़ी स्त्री ने उठने की कोशिश की, लेकिन युवक ने झुककर उसके पैर छुए तो वह बैठी-बैठी ही उसकी पीठ सहलाने लगी। उनके बीच क्या बात हुई, सुनाई नहीं दिया। ट्रेन चलने तक उसका हाथ युवक की बाँह पर बना रहा।
गाड़ी फिर आगे बढ़ी। अब खेत कुछ अधिक खुले थे। सिंचाई की एक नाली में पानी चमक रहा था। किनारे खड़े दो बगुले ट्रेन पास आने पर उड़ गए। उनके सफेद पंख धूप में एक क्षण के लिए बहुत उजले दिखाई दिए। कुछ दूर एक भैंस पानी में खड़ी थी; केवल उसकी पीठ, गर्दन और सींग बाहर थे। किनारे बैठा लड़का एक लकड़ी से पानी कुरेद रहा था। उसने हमारी ओर देखा भी नहीं।
मैं देर तक उस दिशा में देखता रहा। ट्रेन से आती हवा में अब मिट्टी और कहीं पास बहते पानी की हल्की गंध थी। पटरियों के साथ दौड़ते तार ऊपर-नीचे होते दिखाई देते थे। बिजली के खंभे एक निश्चित अंतराल पर आते और निकल जाते। दूर किसी खेत की मेड़ पर लाल कपड़े पहने स्त्री चल रही थी। उसके सिर पर रखा घास का गट्ठर उसके कदमों के साथ धीरे-धीरे हिल रहा था।
जेब में मोबाइल का भार महसूस हुआ तो हाथ फिर उसकी ओर गया। एक बार निकालकर देखा। वही काली स्क्रीन।
इस बार उसे देखकर खीज नहीं हुई। उसे वापस रख दिया।
बाहर एक छोटा-सा तालाब आया। पानी कम था, किनारों पर मिट्टी खुली हुई थी, लेकिन बचे हुए पानी में आसमान का नीला टुकड़ा साफ दिखाई देता था। उसके पास खड़ा पेड़ भी उसमें उतर आया था। ट्रेन के हिलते डिब्बे से वह दृश्य कुछ क्षण दिखाई दिया, फिर झाड़ियों के पीछे छिप गया। मैंने मुड़कर उसे दोबारा देखने की कोशिश की। नहीं दिखा।
अजीब लगा कि इतने छोटे दृश्य का छूट जाना भी खल सकता है।
मैं इसी रास्ते से पहले भी कई बार गुजरा था। वह तालाब पहले भी रहा होगा, खेत भी, पानी में खड़ी भैंस भी किसी न किसी दिन दिखाई दी होगी। लेकिन मेरे पास उनकी कोई स्मृति नहीं थी। पिछली यात्राओं में कौन-सा वीडियो देखा था, वह भी याद नहीं था। बस इतना याद था कि सफर कट गया था।
आज सफर कट नहीं रहा था। उसमें चीजें जुड़ रही थीं।
डिब्बे में लौटकर देखा तो वृद्ध ने अपना थैला पैरों के बीच रखा हुआ था और आँखें मूँद ली थीं। उनके हाथ की पकड़ छड़ी पर कुछ ढीली हो गई थी। सामने के दोनों यात्री खीरे खत्म कर चुके थे। एक ने दूसरे को अपने गाँव का रास्ता समझाया। युवा स्त्री ने बच्चे के माथे का पसीना पोंछा। बच्चा अब उसकी बाँह पर सिर टिकाए बाहर देख रहा था। बीच-बीच में कोई नई चीज दिखाई देती तो उँगली उठाता, फिर धीरे से हाथ नीचे रख देता।
मुझे लगा, अभी थोड़ी देर पहले तक ये सब लोग मेरे लिए केवल भीड़ थे। अब इनमें से किसी के उतर जाने पर उसकी खाली जगह पहचान सकता था।
ट्रेन की गति धीमी होने लगी। बाहर परिचित पानी की टंकी दिखाई दी। उसके बाद स्टेशन से पहले वाला मोड़ और पटरी के पास की छोटी दुकान। मेरा गंतव्य आने वाला था।
मैंने बैग उठाया तो मन में एक हल्की अनिच्छा हुई। बीस किलोमीटर का सफर समाप्त हो रहा था, लेकिन बाहर देखने की इच्छा अभी बाकी थी। दरवाजे की ओर बढ़ते हुए मैंने वृद्ध को नमस्कार किया। उन्होंने आँखें खोलकर सिर हिलाया। बच्चे ने मुझे जाते देखा तो पूछा, “आपका घर आ गया?”
“हाँ, मेरा स्टेशन आ गया।”
वह कुछ क्षण सोचता रहा, फिर वापस खिड़की की ओर मुड़ गया। उसकी यात्रा अभी चल रही थी।
प्लेटफॉर्म पर उतरते ही धूप फिर सिर पर पड़ी। गर्मी उतनी ही थी। माथे पर पसीना भी फिर उतर आया, लेकिन स्टेशन तक पहुँचते समय भीतर जो झुँझलाहट थी, वह कहीं पीछे छूट गई थी। मैंने ट्रेन को धीरे-धीरे आगे जाते देखा। एक खिड़की में बच्चे का चेहरा फिर दिखाई दिया। उसने मुझे पहचाना और हाथ हिलाया। इस बार मैं तब तक हाथ उठाए रहा, जब तक उसका डिब्बा दूर नहीं हो गया।
जेब से मोबाइल निकाला। बंद स्क्रीन में अपना धुँधला चेहरा दिखाई दिया और उसके पीछे प्लेटफॉर्म की छत का एक हिस्सा। सुबह से जिसे लेकर परेशान था, उसी को देखते हुए अब मन में एक अजीब-सा सुकून था।
यदि मोबाइल चार्ज होता, यदि चार्जर साथ ले आया होता, तो क्या मैं बच्चे को समोसा बाँटते देख पाता? उस वृद्ध के थैले में बेटे से मिलने की तैयारी पहचान पाता? क्या पानी में खड़े बगुले, तालाब में उतरा आसमान और खिड़की से पीछे भागते पेड़ मेरी स्मृति में आते?
शायद मैं इसी सीट पर बैठा, इसी हवा में साँस लेता हुआ, कहीं और होता।
स्टेशन के बाहर निकलते समय एक पीपल की छाया पड़ी। मैं उसके नीचे क्षण भर रुका। ऊपर पत्ते हिल रहे थे। धूप उनके बीच से टूटकर जमीन पर पड़ती और हवा चलने पर छोटे-छोटे उजले धब्बे अपनी जगह बदल लेते। मैंने सिर उठाकर देखा। कुछ देर तक केवल देखा।
अगली यात्रा में चार्जर रखना शायद फिर याद रहेगा। मगर अब अपने लिए इतना अवश्य रखूँगा—खिड़की के पास बैठने का कुछ समय, जिसमें जेब में रखा मोबाइल वहीं रहे और बाहर गुजरती दुनिया मेरी आँखों तक पहुँच सके।
उस दिन घर से निकलते समय मुझे लगा था कि मोबाइल की बैटरी खत्म होने से सफर मुश्किल होगा। लौटने पर याद आया कि उस छोटी-सी यात्रा में कितनी चीजें मिलीं। उनमें से एक की भी तस्वीर मेरे पास नहीं थी।
फिर भी वे सब मुझे साफ दिखाई दे रही थीं।
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
