कविता
मुझे नहीं पता कल क्या होगा मैं अज्ञात हूँ
वक्त का मारा हुआ हूँ, ठुकराया हुआ हूँ
न बेबस हूँ, न लाचार हूँ
अपनों दुबारा सताया गया हूँ
हर पल कैसे बीतता जा रहा है, समय का मारा हुआ हूँ मैं
खुद की कहानी का सच्चा किरदार हूँ मैं
दूसरे की कहानी मैं गुनाहगार हूँ मैं, क्योंकि ,समझ के परे हूं मैं
बोलता हुआ, अनकहा सा लब्ज़ हूँ मैं
दूसरों का तू आईना हूँ मैं, किन्तु खुद से अंजान हूं मैं
लोगों की शायरी का शायराना अंदाज हूँ मैं, किन्तु खुद की शायरी का दुःखी किरदार हूँ मैं….
— गंगा मांझी
