राजनीति

लोकतंत्र ‘कुर्सी की सुरक्षा’ में नहीं, बल्कि अंतिम व्यक्ति की मुस्कान में निहित है

देश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर नज़र डालें तो एक बेहद विडंबनापूर्ण और चिंताजनक तस्वीर उभरती है। संसद से लेकर सड़क तक, सत्ता के गलियारों में केवल एक ही धुरी पर सियासत घूम रही है ‘कुर्सी’,जी हां  कुर्सी की चाहत,एक तरफ़ सत्तासीन दल अपनी विजय और वर्चस्व को बनाए रखने की जद्दोजहद में है, तो दूसरी तरफ़ विपक्ष हर उस मौक़े की तलाश में है जिससे सत्ता की सीढ़ियां उसके हाथ लग सकें। इस रस्साकशी के केंद्र में अगर कोई सबसे ज्यादा पिस रहा है, तो वह है देश की ‘बेचारी जनता’, जिसकी आंखें लोकतंत्र के इस खेल में केवल तमाशबीन बनकर रह गई हैं।

खाली हाथ जनता और मताधिकार की मजबूरी,

लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व यानी चुनाव, जनता के लिए अब उम्मीद से ज्यादा एक विवशता (मजबूरी) बनता जा रहा है। मतदान के दिन क़तारों में खड़ी जनता के हाथ में भले ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताक़त यानी वोट की ताक़त होती है, लेकिन परिणाम आने के बाद वही जनता खुद को ठगा और ख़ाली हाथ महसूस करती है।

रोज़गार की तलाश में दर-दर भटकते युवा, महंगाई की मार से कराहता मध्यम और ग़रीब वर्ग, जब यह देखता है कि चुनाव के समय किए गए वादे हवा हो गए, तो उसका लोकतंत्र से भरोसा डगमगाने लगता है। आज़ादी के इतने दशकों बाद भी आम आदमी की बुनियादी ज़रूरतें (रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार) चुनावी बहसों के केंद्र से ग़ायब होकर केवल घोषणापत्रों के पन्नों तक सिमट कर रह गई हैं।

सुलगता जनाक्रोश और राजनीतिक बहरापन,

देश के भीतर आज जो असंतोष सुलग रहा है, वह किसी से छिपा नहीं है। जब एक पढ़ा-लिखा युवा नौकरी के लिए लाठी खाने को मजबूर होता है, जब गृहिणियां बढ़ती रसोई गैस और खाद्य पदार्थों की क़ीमतों के आगे दम तोड़ती हैं, तो समाज में एक जनाक्रोश जन्म लेता है।

लेकिन विडंबना यह है कि सत्ता और विपक्ष दोनों ही इस जन-आक्रोश की भाषा को या तो सुनना नहीं चाहते या फ़िर इसे अपनी सुविधानुसार राजनीतिक चश्मे से देखते हैं। जनता की तक़लीफें जब चुनावी एजेंडे से बाहर हो जाती हैं, तब यह आक्रोश व्यवस्था के प्रति अविश्वास में बदलने लगता है, जो किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक संकेत है।

पक्ष और विपक्ष की सहमती का अभाव क्यों?

सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि मंहगाई, रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर देश के सभी राजनीतिक दलों के बीच आम सहमति  क्यों नहीं बन पाती?

राजनीतिक नफा-नुक़सान हमारे यहाँ की राजनीति ‘सहयोग’ पर नहीं, बल्कि ‘विरोध’ की संस्कृति पर टिकी है। यदि एक दल किसी गंभीर मुद्दे पर सुधार की बात करता है, तो दूसरा दल उसमें अपनी राजनीतिक ज़मीन तलाशने लगता है।

चुनावी चश्मे से नीतियां, और योजनाएं,

हर मुद्दे को दीर्घकालिक राष्ट्रीय विकास के दृष्टिकोण से देखने के बजाय अगले चुनाव के समीकरणों के आधार पर परखा जाता है।

जवाबदेही का अभाव,जब तक दलगत राजनीति देशहित पर हावी रहेगी, तब तक आम जनता के असल मुद्दे हाशिए पर ही रहेंगे।

भारत का भविष्य, किस दिशा में जा रहा है देश?

भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शुमार होने का दावा करता है, यहाँ तकनीकी प्रगति और बुनियादी ढांचे का विस्तार भी हो रहा है। 

यदि देश का भविष्य सुरक्षित करना है, तो राजनेताओं को कुर्सी की अंधी दौड़ से बाहर निकलकर ज़मीनी सच्चाइयों का सामना करना होगा। रोज़गार के नए अवसरों का सृजन, महंगाई पर लगाम और युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए पक्ष और विपक्ष को वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठकर एक साझा राष्ट्रीय एजेंडा तैयार करना होगा।

अन्यथा, यह ख़ाली हाथ जनता का मौन आक्रोश कब किस रूप में फूट पड़े, इसका अनुमान लगाना किसी के लिए भी संभव नहीं होगा। लोकतंत्र की असली ख़ूबसूरती ‘कुर्सी की सुरक्षा’ में नहीं, बल्कि अंतिम व्यक्ति की मुस्कान में निहित है।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़  

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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