कुण्डलिया छंद
देना किसको दोष है, पहले जाओ भूल।
पहले इसको झेल लो, चुभा हुआ जो शूल।।
चुभा हुआ जो शूल, बैठ मत माथा पीटो।
बस्ती हुई तबाह, लगाओ पावर वीटो।।
कहें मित्र यमराज, भूल खाना मत छेना।
दिया प्रकृति ने खूब, आज अब हमको देना।।२४३
होना ऐसा चाहिए, विकसित कोई तंत्र।
दुर्घटना हो ही नहीं, लिखा जाय अब मंत्र।।
लिखा जाय अब मंत्र, रहे हर प्राण सुरक्षित।
या फिर संत-महंत, करें जगती को दीक्षित।।
दुर्घटना के बाद, पड़े क्यों हमको रोना।
मिलकर करो उपाय, चाहते सबका होना।।२४४
सबका निज मंतव्य है, फिर कैसी तकरार।
लोकतंत्र ने है दिया, सबको यह अधिकार।।
सबको यह अधिकार, समझिए जिम्मेदारी।
व्यर्थ ठानना रार, पड़ेगी सब पर भारी।।
मगर कहीं पर मित्र, एक ऐसा है तबका।
जिस पर है दायित्व, हमेशा से ही सबका।।२४५
जीवन में किसको भला, मिले कहाँ आराम।
चाहत रहती जब सदा, सब कुछ मिले हराम।।
सब कुछ मिले हराम, यही कलयुग है भैया।
सब झूठी है बात, हाय मत कर तू दैया।।
कहें मित्र यमराज, नहीं होता सब नीमन।
सत्य हमारी बात, चले अब ऐसे जीवन।।२४६
राधा नाम है मोक्ष का, राधा प्रेम स्वरूप।
राधा बिन फीका लगे, माधव का भी रूप॥
माधव का भी रुप, संग जब राधा है का।
दिखता अद्भुत रुप, हमें मन वृंदावन का।
मान रहा संसार, दूर होगी सब बाधा।
रटते रहिए नाम, आप बस केवल राधा॥२४७
गुरुजन देते ज्ञान का, सबको ही भंडार।
कहाँ समझते हैं सभी, यह जीवन आधार।।
यह जीवन आधार, और उद्धार हमारा।
नमन करूँ सौ बार, बोध है इतना सारा।।
यही सत्य है बात, सोचिए सब अपने मन।
मत करिए अपमान, कहें जिनको भी गुरुजन।।२४८
दुनिया का दस्तूर है, बने रहो अंजान।
हम क्यों मानें तब भला, बँटता है जो ज्ञान।।
बँटता है जो ज्ञान, भाव कितना है इसका।
विधि का अजब विधान, सत्य कहना है किसका।
कहें मित्र यमराज, बात सुन मेरी मुनिया।
जैसे चलती आज, चलेगी वैसे दुनिया।।२४९
आपस में अब हम सभी, खींचें नई लकीर।
बनना अब हमको नहीं, पैदायशी फकीर।।
पैदायशी फकीर, समझ की बड़ी जरूरत।
खिंचती जो दीवार, मिटाओ बढ़ती नफरत।।
कहें मित्र यमराज, चाल जो चलता काकस।
नफ़रत की दीवार, गिराकर मिलिए आपस।।२५०
चाहे जितना हम सभी, करते रहें उपाय।
खुद ही हम खुद के लिए, बनते कहाँ सहाय।।
बनते कहाँ सहाय, दोष औरों का देते।
बड़े मजे में आप, नाव अपनी हैं खेते।।
कहें मित्र यमराज, लोग सब हमें सराहें।
करना क्यों तकरार, यही हम केवल चाहें।।२५१
संरक्षण को आजकल, मिले नहीं अब भाव।
सहना पड़ता व्यर्थ में, मिलता है जो घाव।।
मिलता है जो घाव, जमाना ऐसा आया।
लगता है अब आज, व्यर्थ है मानव काया।।
कहें मित्र यमराज, मृत्यु का ओढ़ आवरण।
फिर करिएगा आप, किसी का भी संरक्षण।।२५२
आया कैसा दौर में, लोग रहे हैं भोग।
पक्षपात के फेर में, बढ़ता जाता रोग।।
बढ़ता जाता रोग, आप हम सब हैं ज्ञानी।
फिर भी रोते आप, याद आती क्यों नानी।।
कहें मित्र यमराज, स्वार्थ की देखो माया।
बनने रिश्तेदार, निकट हम सबके आया।।२५३
ज्ञानी तो इस दौर में, वे ही सारे लोग।
औरों को जो बाँटते, बड़े प्रेम से रोग।।
बड़े प्रेम से रोग, चाल अपनी जो चलते।
वही आपको आज, सभी में अच्छे लगते।।
पक्षपात आरोप, लगाते रहिए जानी।
खुश होते हैं खूब, लोग कहते जब ज्ञानी।।२५४
हिंदी दिवस मनाइए, कौन रहा है रोक।
पर इतना भी जानिए, हमें तनिक है शोक।।
हमें तनिक है शोक, राजभाषा ये अब तक।
व्यर्थ सुने क्या गान, राष्ट्र की भाषा जब तक।।
कहें मित्र यमराज, नहीं दिखलाओ बिंदी।
करो आप तब बात, राष्ट्र भाषा जब हिंदी।।२५५
अवगुण यह भी एक है, इतना हमको ज्ञान।
मगर व्यर्थ की बात का, हम देते कब ध्यान।।
हम देते कब ध्यान, मूर्ख हमको क्या समझे।
जो आकर बेकार, यहाँ हम खुद ही उलझे।।
कहें मित्र यमराज, समझिए मेरे भाया।
क्यों देते हो दोष, भ्रमण बसुधा यह आया।।२५६
चाहो यदि कल्याण तो, आओ मम दरबार।
नहीं पता क्या आपको, है अपनी सरकार।।
है अपनी सरकार, यमराज बैठे हैं कुर्सी।
नीति नियम सिद्धांत, कीजिए मातम पुर्सी।।
कहें मित्र यमराज, आप धन खूब उगाहो।
सोच समझ कर आप, भला तुम जिसका चाहो।।२५७
करते जो व्यायाम नित, रहें स्वस्थ सानंद।
मन में भरे उमंग वो, पाते सुखदानंद।।
पाते सुखदा नंद, सफलता पास बुलाते।
रोग रहे हैरान, भागकर कोसों जाते।।
कहें मित्र यमराज, आप जीवन भर हँसते।
उठकर प्रातःकाल, नित व्यायाम जो करते।।२५८
आँसू पीकर क्यों भला, आप चलाते काम।
जान-बूझकर हो रहे, नाहक ही बदनाम।।
नाहक ही बदनाम, चाहता आज जमाना।
दूजा खींचो टाँग, लाभ बस खूब उठाना।
कहें मित्र यमराज, आप अब बनिए बासू।
पहले मानो बात, छोड़कर पीना आँसू।।२५९
कितना देता कौन है, अब आँसू को भाव।
सब देना हैं चाहते, बस उपहारी घाव।।
बस उपहारी घाव, नहीं जो आप देखते।
रिसता भीतर घाव , जिसे सब कहाँ समझते।।
कहें मित्र यमराज, स्वार्थ सबका है जितना।
फिर भी पूछें आप, मानना किसको कितना।।२६०
ऐसी करनी कीजिए, दुनिया देखे रंग।
नाहक चिंता आपकी, पड़े रंग में भंग।।
पड़े रंग में भंग, यही है आज जमाना।
करो कमाई और, किसी को नहीं बताना।।
कहें मित्र यमराज, कीजिए वैसी तैसी।
मज़ा कीजिए आप, आज की दुनिया ऐसी।।२६१
जिसको अपना कह रहे, वही दे रहा दाँव।
गाँवों में भी अब कहाँ, पहले जैसी छाँव।।
पहले जैसी छाँव, व्यर्थ बनना है कच्चा।
मिले न सच्चा मीत, बड़े मूरख हो बच्चा।।
कहें मित्र यमराज, समझना इसको उसको।
धोखा देगा रोज, कहो तुम अपना जिसको।।२६२
अब-तक कोई है नहीं, अपने शीश उधार।
निकल चलें हम आप तो, छोड़-छाड़ भंगार।।
छोड़ -छाड़ भंगार, नहीं अब अपना कोई।
चलो चलें उस पार, व्यर्थ है किस्सागोई।।
कहें मित्र यमराज, रहें आगे भी लक-दक।
बचा रहे सम्मान, आज तक जैसे अब-तक।।३६३
गौरा माँ के लाल को, सुमिरो बारम्बार।
विघ्न हरण मंगल करण, होती जय जयकार।।
होती जय जयकार, करो गणपति की पूजा।
रिद्धि-सिद्धि के नाथ, नहीं कोई जग दूजा।।
कहें मित्र यमराज, पड़ा क्या तुमको दौरा।
कृपा सिंधु दातार, हमारी माँ हैं गौरा।।२६४
गौरा माँ के लाल हैं, लम्बोदर गणराज।
मोदक प्रिय सरकार हैं, करते सबके काज।।
साजें सबके काज, प्रथम पूजित कहलाते।
जो भी सुमिरे आप, विघ्न उसके कट जाते।।
कहें मित्र यमराज, चरण इनके सुखकौरा।
देवों के सिरमौर, प्राण प्यारे शिव गौरा।।२६५
मोदी जी लगने लगे, जैसे हों अवधूत।
बेबस आज विपक्ष है, कहते मोदी भूत।।
कहते मोदी भूत, धरा ये मानव आया।
देवदूत बन आज, विश्व में नाम कमाया।।
कहें मित्र यमराज, लोग कुछ खोजें गोदी।
मिले नहीं अब ठौर, पड़ा पीछे है मोदी।।२६६
आशा कभी न छोड़िए, सीधी सी है बात।
वरना खाते रहोगे, प्रिय मित्र तुम लात।।
प्रिय मित्र तुम लात, व्यर्थ है आप उदासी।
अच्छा होगा छोड़िए, निराशा सारी बासी।।
कहें मित्र यमराज, हौसला रखो अकाशा।
जग को लोगे जीत, कभी मत छोड़ो आशा।।२६७
नीमकरोली नाम की, महिमा अपरम्पार।
कैंची धाम में बैठके, करते भव से पार।।
करते भव से पार, राम की धुन भी गाते।
आते भक्त जो द्वार, कृपा हनुमत की पाते।।
कहें मित्र यमराज, आप मुख निकले बोली।
मिट जाते सब कष्ट, कहें सब नीमकरोली।।२६८
मानव तो हम आप हैं, फिर भी होता खेद।
ऊँच-नीच के नाम पर, करते रहते भेद।
करते रहते भेद, सोचिए क्या है अच्छा।
नहीं आप भगवान, रहे ले आप परीक्षा।।
कहें मित्र यमराज, नहीं बनना है दानव।
करिए कभी न भेद, भाग्य से जन्मे मानव।।२६९
स्पंदन मरता है भले, झूठे लगते साथ।
मन में पावनता बसी, प्रभु जी थामें हाथ।।
प्रभु जी थामें हाथ, प्रफुल्लित मानस होता।
जलती जीवन ज्योति, फूटता मोहक सोता।।
कहें मित्र यमराज, यही है सच्चा वंदन।
नहीं और की चाह, कृपा प्रभु जी का स्पंदन।।२७०
करते सारे काम सब, सुविधा के अनुसार।
फिर क्यों करते लोग हैं, नाहक ही तकरार।।
नाहक ही तकरार, संग में गाओ गाना।
झूठा है ये प्यार, व्यर्थ बाँसुरी बजाना।।
कहें मित्र यमराज, रहो ऐसे ही चलते।
और नहीं कुछ काम, आप जो इतना करते।।२७१
घर की रौनक बेटियाँ, आँगन की मुस्कान।
मात-पिता के हृदय का, नभ जैसा अरमान।।
नभ जैसा अरमान, आज अब डर है भारी।
तेजी से है बढ़ रही, लगे कैंसर सी बीमारी।।
चिंतित आज समाज, परीक्षा जैसे सबकी।
यही कहानी आज, सभी के अपने घर की।।२७२
मंदिर में होता सदा, भक्ति भाव संवाद।
और संग में गूँजता, घंटा शंख निनाद।।
घंटा शंख निनाद, भावना पावन होती।
ले आती फरियाद, बिलखती वह है रोती।।
कहें मित्र यमराज, मानते जिनको फिर-फिर।
उनके दर पर शीश, झुकाने जाते मंदिर।।२७३
मूरत पूजन भाव से, रखते मन में आस।
आज विसर्जन की घड़ी, आँखें हुईं उदास।।
आँखें हुईं उदास, विदा होते गणराजा।
आना अगले साल, विनय सब करे समाजा।।
कहें मित्र यमराज, यही जगत का सूरत।
भक्तों के मन आप, अमर रहती है मूरत ।।२७४
करने जाते हैं सभी, मन से विदा गणेश।
नैन भरे जलधार हैं, दूर सभी आवेश।।
दूर सभी आवेश, भक्त कहते फिर आना।
अगले बरस तू शीघ्र, लौटकर फिर आ जाना।।
कहें मित्र यमराज, चले हैं झोली भरने।
नाम विसर्जन आज, तिरोहित गणपति करने।।२७५
मानव तो हम आप हैं, फिर भी होता खेद।
ऊँच-नीच के नाम पर, करते रहते भेद।
करते रहते भेद, सोचिए क्या है अच्छा।
नहीं आप भगवान, रहे ले आप परीक्षा।।
कहें मित्र यमराज, नहीं बनना है दानव।
करिए कभी न भेद, भाग्य से जन्मे मानव।।२७६
इतनी सी करिए कृपा, संकट हरो गणेश।
छोटा सा अनुरोध है, मानो श्री विघ्नेश।।
मानो श्री विघ्नेश, खूब मोदक तब खाओ।
व्यर्थ छोड़ तकरार, आप निर्धन घर आओ।।
कहें मित्र यमराज, बात न चुपड़ी चिकनी।
करो जगत कल्याण, बात मेरी बस इतनी।।२७७
नवरात्रि
माता के दरबार में, लगती भारी भीड़।
लगता सबका अब यहीँ, होगा प्यारा नीड़।।
होगा प्यारा नीड़, भेद बस मैय्या जानें।
होते हम हैं कौन, बात मेरी जो मानें।।
कहें मित्र यमराज, गाड़कर अपना छाता।
करना है जो आप, करो अब जग की माता।।२७८
होगा पूजा पाठ फिर, आदि शक्ति के नाम।
इसके पीछे मानिए, सबका स्वारथ आम।।
सबका स्वारथ आम, मातु को हम भरमाएँ।
अपना मानव धर्म, दिवस नौ खूब निभाएँ।।
कहें मित्र यमराज, मातु मम हर लो रोगा।
हमें नहीं है ज्ञान, हमारा कल क्या होगा।।२७९
सतगुरु
अपना कोई है नहीं, आप लीजिए जान।
केवल सतगुरु आपका, यही आज का ज्ञान।।
यही आज का ज्ञान, शरण जा शीश झुकाओ।
हर दुविधा से दूर, मार्ग जीवन का पाओ।।
कहें मित्र यमराज, नहीं तुमको है डरना।
सतगुरु की जब छाँव, मस्त जीवन हो अपना।।२८०
अपने पर विश्वास का, सीख लीजिए मंत्र।
सतगुरु देंगे आपको, सुखदा जीवन यंत्र।।
सुखदा जीवन यंत्र, दूर कुविचार करेगा।
गुरु कृपा से आप, सकल अँधियार मिटेगा।।
कहें मित्र यमराज, देखिए सुंदर सपने।
श्रद्धा अरु विश्वास, लगें तब सतगुरु अपने।।२८१
वंदन सद्गुरु कीजिए, हर दिन आठों याम।
मातु-पिता की वंदना, लेकर प्रभु का नाम।।
लेकर प्रभु का नाम, नहीं है मुश्किल इतना।
समझ रहे हम आप, बोझ जो इसको जितना।।
कहें मित्र यमराज, आप बन जाओ नंदन।
मिले कृपा आशीष, मातु-पित सद्गुरु वंदन।।२८२
