सोरठा छंद
बादल गरजे खूब, मन फुहार से भीगता।
मस्ती में सब डूब, छाया हर्षोल्लास है।।
गिरने लगी फुहार, मगन मन लगा डोलने।
गाते राग मल्हार, आया सावन मास है।।
उलझन सबकी एक, नहीं सोचते हम सभी।
खींचें चित्र अनेक, अपने-अपने स्वार्थ में।।
सबकी उलझन एक, व्यर्थ पीटना माथ है।
अपना आप विवेक, सभी लगाते स्वयं का।।
कैसी हो सरकार, आप हमसे मत पूछो।
करते नहीं विचार, वोट डालते समय तो।।
कैसी हो सरकार, भला आज क्यों पूछे।
सोचे बिना जमीर, कल को बेचा आपने।।
भूली बिसरी बात, करें भला हम याद क्यों।
बिगड़ जायेगी रात, चिंता करना व्यर्थ है।।
भूली बिसरी बात, जीवन के अभियान में।
मत समझो तुम घात, इसमें ऐसा कुछ नहीं।।
भूली बिसरी बात, अपने ही अंदाज में।
कुछ खेलें जज्बात, और कुछ हमें रुलाते।।
प्रेम जगत का सार, कौन भला अब मानता।
झूठा है आधार, चीख-चीख कर कह रहा।।
सभी बड़े विद्वान, आप नहीं हैं समझते।
भूल प्रेम का ज्ञान, बने मूर्ख हैं घूमते।।
सबसे रखना मेल, इतनी सी तो बात है।
बस रचना मत खेल, कठिन आपको जब लगे।।
आओ खेलें खेल, कहा मित्र यमराज ने।
शीश लगाएं तेल, दिल दिमाग ठंडा रखें।।
सबसे रखना मेल, अति उत्तम आधार है।
अगर मानिए जेल, खुशियों की सौगात का।।
बहुत हो चुका खेल, बंद करो अब खेलना।
सबसे रखना मेल, यही समय की माँग है।।
कैसे भरें उड़ान, कितना किया विचार है।
मुफ्त चाहते दान, फिर चिंता क्यों कर रहे।।
होता है अभिमान, इतना भी अच्छा नहीं।
कैसे भरें उड़ान, आप किसी से पूछ लो।।
क्यों बनते नादान, मूरख बनकर तुम भला।
कैसे भरें उड़ान, नहीं सोचते इसलिए।।
जाओ बेचो तेल, हो सवर्ण तो क्या करें।
बने घूमना रेल, मरती जाती आस है।।
होना आज सवर्ण, क्या मेरा अपराध है।
जैसे बेबस कर्ण, हमतो ऐसे हो गए।।
जता रहे अहसान, करते जो सहयोग वो।
जब अटकी थी जान, भूले अपना दौर निज।।
बेवकूफ इंसान, आया ऐसा दौर अब।।
लोग कहें नादान, भूल रहा अहसान वो।।
रहते मद में चूर, इतना उनको दंभ है।
घाव बने नासूर, किसको देंगे दोष जब।।
कहें मित्र यमराज, घाव बने नासूर क्यों।
लगे कोढ़ में खाज, भूल नहीं ऐसा करो।।
अपनों से लाचार, आप सब जान रहे हो।
घाव बने नासूर, बने हुए बेवकूफ तुम।।
हुए सभी बीमार, किया प्रकृति ने वार जब।
व्यर्थ द्रवित उद्गार, बस्ती हुई तबाह तब।।
बस्ती हुई तबाह, देते ईश्वर दोष क्यों।
करिए आप निबाह, जो होना था हो गया।।
प्रकृति भी है दंग, देखी मानव वेदना।
मानवता बदरंग, पर वो भी है जानती।।
लेना सरल उधार, करते कहाँ विचार हम।
हो जाते लाचार, देने का जब वक्त हो।।
कल जब दिया, उधार, बोध नहीं था तब हमें।
खुद बेबस लाचार, देख रहा हूँ आज मैं।।
मिले कहाँ आराम, खुद बनते दुश्मन जहाँ।
होने से बदनाम, प्रभु जी हमें बचाइए।।
मिले कहाँ आराम, सब जब सबको कोसते।
लगे नहीं कुछ काम, इससे अच्छा क्या भला।।
शब्दों का प्रहार, इतना भी करिए नहीं।
तुम मुक्का दो चार,इससे अच्छा मार दो।।
मानव आप विकार, नहीं छोड़ते क्यों भला।
नाहक नित्य शिकार, इसीलिए तो हो रहा।।
अपने सभी विकार, गुरू चरण में डाल दो।
तब होगा उद्धार, बिना किसी संदेह के।।
करिए कभी न भेद, प्रेम सहित मिलकर रहें।
यदि है कोई खेद, खुलकर तुमउसको कहो।।
रहो सदा खुशहाल, करो कभी मतभेद तुम।
करना पड़े मलाल, कभी आपस में लड़कर।।
चिंता करते यार, जीत हार की क्यों भला।
बाद करो तकरार, कुछ तो पहले कीजिए।।
मातु-पिता का मान, करना हमको चाहिए।
रहिए सीना तान, बिना किसी से भी डरें।।
तब क्यों जीते आप, जीने का जब गुण नहीं।
और करो मत पाप, सीखो जीवन सार तुम।।
रहे सदा ही वास, बड़े-बुजुर्गों का जहाँ।
ईश्वर करें प्रवास, बढ़भागी वह वंश है।।
वहाँ सभी का मान, जिस घर में रहते बड़े।
रखते प्रभु जी ध्यान, बड़भागी उस वंश का।।
पहचान
हो निज की पहचान, सभी लोग हैं चाहते।
इसका कर्म विधान, मगर समझते हैं नहीं।।
कहते हैं यमराज, हमें आप पहचान लो।
गिरता सबका ताज, जिसके आगे एक दिन।।
उसकी निज पहचान, हर प्राणी को दंभ है।
व्यर्थ संग में ज्ञान, निकले तन से प्राण ज्यों।।
आजादी
आजादी की आस, सींचा अपने खून से।
लड़े आखिरी साँस, और हुए बलिदान पर।।
मन में जगे उजास, आजादी के गीत गा।
पूरा हो विश्वास, गगन तिरंगा कह रहा।।
आजादी के साथ, टूट गई सब बेड़ियाँ।
लक्ष्य हमारे हाथ, सपने जो रणबाँकुरे।।
आजादी का मान, हर भारतवासी रखे।
होगा गौरव गान, तभी हमारे राष्ट्र का।।
