वो हसीन दिन
बी.एड. कॉलेज की वह विशाल इमारत, हरे-भरे मैदान और कैंपस का वह पुराना पीपल का पेड़… जहाँ ज़िंदगी अपनी पूरी रवानी में बहती थी। इसी कॉलेज में राज और अंजुम का दाख़िला एक ही सत्र में हुआ था। शुरुआत में दोनों बस सहपाठी थे, लेकिन धीरे-धीरे वक़्त ने उन्हें एक-दूसरे के बेहद क़रीब ला खड़ा किया।
कॉलेज की लाइब्रेरी दोनों का पसंदीदा ठिकाना थी। लाइब्रेरी के शांत माहौल में एक ही मेज़ पर आमने-सामने बैठकर पढ़ना, नज़रें चुराकर एक-दूसरे को देखना और किताबों के बीच चुपचाप चिट्ठियाँ रखकर विचारों का आदान-प्रदान करना उनकी दिनचर्या बन गया था। कभी राज कोई हिंदी साहित्य की किताब अंजुम की तरफ़ खिसका देता, तो कभी अंजुम उर्दू शायरी का दीवान राज को थमा देती। किताबों की यह लेन-देन केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं थी, यह उनके दिल की ज़ुबान बन चुकी थी।
पढ़ाई के अलावा स्पोर्ट्स रूम में टेबल टेनिस के मैच उनकी नजदीकियों की गवाही देते। जब भी दोनों के बीच टेबल टेनिस का मुकाबला होता, तो टेबल के आर-पार गेंद से ज्यादा उनकी हँसी और मीठी नोक-झोक उड़ती थी। राज अक्सर अंजुम को जिताने के लिए जानबूझकर आसान शॉट छोड़ दिया करता था, और अंजुम उसकी इस चालाकी को समझकर मंद-मंद मुस्कुरा देती।
कॉलेज के सांस्कृतिक कार्यक्रमों और वार्षिक फंक्शन में दोनों की जोड़ी छा जाती थी। नाटक और नाटकों के मंचन में जब दोनों किरदार निभाते, तो मंच पर उनकी अदाकारी देखकर हर कोई वाह-वाह कर उठता। राज का ओजस्वी भाषण जहाँ सभागार में तालियों की गड़गड़ाहट गूँजा देता, वहीं अंजुम की मखमली आवाज़ में गाए गए गीत-संगीत के कार्यक्रम माहौल में मिठास घोल देते थे। फंक्शन के बाद शाम को उसी पीपल के पेड़ की छाँव में बैठकर दोनों घंटों बातें करते, सपनों के ताने-बाने बुनते और चाय की चुस्कियों के साथ भविष्य की योजनाएँ बनाते।
देखते ही देखते बी.एड. का अंतिम वर्ष भी पूरा होने को आया। फेयरवेल का दिन था। चारों तरफ खुशी और विदाई के गम का मिला-जुला माहौल था। लेकिन राज और अंजुम के दिलों में एक अजीब सी हलचल थी। राज, जो स्वभाव से थोड़ा शर्मीला था, कभी अंजुम से अपने प्यार का सीधा इज़हार नहीं कर पाया था।
वही पीपल का पेड़, जहाँ वे अक्सर बैठा करते थे, आज बहुत उदास लग रहा था।
अंजुम की आँखें नम थीं। उसने अपनी भर्राई हुई आवाज़ में, काँपते होंठों से पूछा, “क्या अब हम कभी नहीं मिलेंगे, राज? क्या आज भी तुम मुझसे कुछ कहना नहीं चाहते?”
राज ने भारी मन से अपनी जेब से अपनी पुरानी डायरी निकाली और चुपचाप अंजुम के हाथ में थमा दी। उस डायरी के पन्नों पर अंजुम की हँसी, उसकी बातें और राज के दिल के अनकहे जज्बात दर्ज थे।
अंजुम ने काँपते हाथों से डायरी खोली। आखिरी पन्ने पर लिखा था,
“अंजुम, तुम मेरी मोहब्बत हो। मैं अपनी जिंदगी के हर सबक में तुम्हारा साथ चाहता हूँ। क्या तुम मेरी हमसफ़र बनोगी? मैं कब से बेताब था, तुम तक अपने दिल की आवाज़ पहुँचाने के लिए…”
अंजुम ने रोते हुए डायरी अपने पास संभाल कर रख ली। उसकी आँखों में बेबसी के आँसू थे। उसने गहरी साँस ली और नम आँखों से राज की तरफ़ देखते हुए कहा:
“तुमने बहुत देर कर दी राज… मैं भी चाहकर अपनी ज़ुबान को जुंबिश न दे सकी। लेकिन तुमने भी कभी मुझसे खुलकर इज़हारे-वफ़ा नहीं किया। मेरे घर वालों ने अब मेरा रिश्ता कहीं और तय कर दिया है… उफ़, हमारे मुक़द्दर में शायद यही दूरी लिखी थी।”
यह कहकर अंजुम वहाँ से रोते हुए चली गई, और राज सन्न सा उस पेड़ के सहारे खड़ा रह गया।
वक्त बीतता गया। दोनों अपने-अपने रास्तों पर बढ़ गए। लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और ही सोच रखा था।
अंजुम के घरवाले जिस परिवार में उसका रिश्ता तय कर चुके थे, वहाँ शादी की तैयारियाँ जोर-शोर से चल रही थीं। लेकिन शादी से महज कुछ हफ्ते पहले एक बहुत बड़ा मोड़ आया। अंजुम को पता चला कि जिस लड़के से उसकी शादी तय हुई है, वह और उसका परिवार दहेज़ के लालची हैं और वे अंजुम की पढ़ाई और क़रियर के सख्त ख़िलाफ़ हैं। अंजुम ने जब इस बात का विरोध किया, तो उन्होंने शादी तोड़ने की धमकी दी।
इस हादसे ने अंजुम के परिवार की आँखें खोल दीं। अंजुम के माता-पिता को अहसास हुआ कि वे अपनी बेटी को ग़लत जगह सौंपने जा रहे थे। उन्होंने तुरंत वह रिश्ता ख़ुद ही तोड़ दिया। इस धोखे और मानसिक तनाव से उबरने के बाद अंजुम ने अपना पूरा ध्यान अपनी पढ़ाई पर लगाया और उच्च शिक्षा हासिल करके एक डिग्री कॉलेज में प्रोफ़ेसर बन गई।
दूसरी तरफ़, राज ने अपने दिल के दर्द को अपनी मेहनत में बदल दिया। उसने दिन-रात पढ़ाई की, प्रतियोगी परीक्षाएँ पास कीं और उसी शहर की एक जानी-मानी यूनिवर्सिटी में विभागाध्यक्ष का पद हासिल कर लिया। राज ने कभी किसी और को अपने जीवन में आने की जगह नहीं दी, उसके दिल में आज भी वही लाइब्रेरी की मेज़ और पीपल का पेड़ ज़िंदा था।
कुछ साल बीतने के बाद, शिक्षा विभाग द्वारा राज्य स्तर पर एक बहुत बड़े नेशनल सेमिनार और कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया।
सेमिनार के दौरान, जब राज मुख्य वक्ता के रूप में मंच पर भाषण दे रहा था, उसकी नज़र अचानक दर्शकों की पहली कतार में बैठी एक महिला पर पड़ी। महरून रंग की साड़ी, आँखों में वही मासूमियत,वह अंजुम थी! राज का दिल एक पल के लिए धड़कना भूल गया, लेकिन उसने ख़ुद को संभाला और अपना भाषण पूरा किया।
सेमिनार के बाद, जब सब लोग चाय-नाश्ते के लिए ‘कॉन्फ्रेंस हॉल’ के गार्डेन में एकत्रित हुए, तो राज के क़दम खुद-ब-खुद अंजुम की तरफ़ बढ़ गए।
दोनों आमने-सामने खड़े थे। इतने सालों का फ़ासला, लेकिन दिलों की धड़कनें वही पुरानी।
राज ने मुस्कुराते हुए कहा, “अंजुम… कैसी हो?”
अंजुम की आँखों में खुशी और हैरानी के आँसू थे। उसने कहा, “राज… तुम? मैं ठीक हूँ। तुम कैसे हो?”
राज ने मुस्कराते हुए कहा, “अंजुम, तुमने उस दिन कहा था कि मैंने देर कर दी। लेकिन क़िस्मत ने आज हमें फ़िर इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। आज तक मेरा किसी से कोई रिश्ता नहीं है और मैं जानता हूँ कि तुम भी अकेली हो। क्या आज भी अभी भी बहुत देर हो चुकी है?”
अंजुम ने अपनी नम आँखें पोंछीं और खिलखिलाकर हँस पड़ी। उसने राज का हाथ थामते हुए कहा, “नहीं राज, इस बार कोई देर नहीं हुई है। क़िस्मत ने शायद हमें तपाकर और परिपक्व बनाकर ही एक करने का फैसला किया था।”
दोनों के परिवार वालों ने इस रिश्ते को ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार किया। कुछ ही महीनों बाद उसी शहर में दोनों की बड़ी सादगी और धूमधाम से शादी हो गई।
कॉलेज की लाइब्रेरी की वो शांत मेज़, टेबल टेनिस के वे मुकाबले, स्टेज के वो नाटक और पीपल के पेड़ की वो छाँव… आज एक मुकम्मल और बेहद ख़ूबसूरत प्रेम कहानी में बदल चुके थे।
शादी के कुछ ही हफ़्तों बाद, राज और अंजुम ने अपने खास दोस्तों को यूनिवर्सिटी के उसी पुराने प्रांगण में एक छोटी सी गेट-टुगेदर पर आमंत्रित किया। वह बी.एड. कॉलेज का परिसर और वही पुराना पीपल का पेड़ आज भी अपनी जगह पर खड़ा था, बस अब वहाँ पुरानी उदासी की जगह उत्सव का माहौल था।
शाम की हल्की धूप में सब लोग कॉलेज के कैंटीन के पास वाली बेंच पर बैठे पुरानी यादें ताज़ा कर रहे थे। लाइब्रेरी की खामोशियाँ, टेबल टेनिस के वो मुकाबले और कॉलेज फंक्शन के वो रंगारंग दिन,बातों-बातों में पुराने किस्से फ़िर से ज़िंदा हो गए।
अंजुम शरमाते हुए मुस्कुरा रही थी, और राज दोस्तों के बीच थोड़ा असहज़ होने का नाटक कर रहा था। तभी कॉलेज के दिनों का उनका एक जिगरी दोस्त, अमित, अपनी चाय की प्याली रखते हुए अचानक ज़ोर से हँसा और राज के कंधे पर हाथ मारकर बोला,
“यार राज! सच बताऊँ, हमें तो कॉलेज के दिनों में दूर-दूर तक शक नहीं हुआ कि तुम्हारी इस ख़ामोशी के पीछे इतना बड़ा चक्रव्यूह चल रहा था! हम सब तो तुम्हें सीधा-साधा समझते रहे, और तुम… तुम तो असली ‘छुपे रुस्तम’ निकले भाई!”
अमित की बात सुनते ही वहाँ मौजूद बाक़ी दोस्त भी ठहाका मारकर हँस पड़े।
एक दूसरी दोस्त, प्रिया, ने मज़ाक़ करते हुए अंजुम की तरफ़ देखा और बोली, “और अंजुम! तुम भी कम नहीं हो। हम सोचते थे कि ये नोट्स और किताबें ही तुम्हारी दुनिया हैं, पर दिल में तुमने राज की डायरी छिपा रखी थी और हमें कानों-कान ख़बर तक नहीं होने दी!”
यह सुनते ही अंजुम के गाल ख़ुशी से लाल हो गए और वह अपनी हँसी रोक नहीं पाई।
राज ने प्यार से अंजुम का हाथ अपने हाथ में लिया, चारों तरफ़ दोस्तों के चेहरे पर छाए अपनापन भरे मुस्कुराते हुए नज़रों को देखा, और मंद-मंद मुसकुराते हुए कहा, “हाँ यार, मान लिया… थोड़ा छुपा रुस्तम तो मैं था ही, वरना इस नायाब हीरे को कैसे ढूँढ पाता!”
सबकी हँसी से वह पूरा कॉलेज प्रांगण गूँज उठा। हवा का एक झोंका आया और पीपल के पत्तों से सरसराहट की ऐसी आवाज़ हुई, मानो वह पुराना पेड़ भी उनकी इस खुशी में ताली बजा रहा हो।
किस्मत ने भले ही कुछ साल के लिए फासले बढ़ाए थे, लेकिन अंततः प्यार, सब्र और दोस्ती की जीत हुई थी। वे सब मिलकर हँसने लगे—एक ऐसे मुकम्मल कल की तरफ देखते हुए, जहाँ खामोशियाँ अब हमेशा के लिए खुशियों में बदल चुकी थीं।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
