डिफॉल्ट

वो पुरानी सफेद हवेली, जिसका नक्काशीदार लकड़ी का दरवाजा पिछले दस साल से बंद पड़ा था। मोहल्ले के बच्चे उसे भुतहा हवेली कहते थे। क्योंकि उन्होंने कभी किसी को अंदर-बाहर आते-जाते देखा ही नहीं था।

परंतु लोगों को पता था कि हवेली में अस्सी साल की रमन्ना माई अकेली रहती हैं। पति उन्हें अकेला छोड़कर इस संसार से विदा हो गए, बेटी ब्याह के बाद अमेरिका चली गई, बेटा विदेशी हो गया। हवेली की दीवारें तो थीं, पर रौनक चली गई थी।

आज विजयादशमी की सुबह, जब पूरा मोहल्ला रावण के पुतले के दहन की तैयारियों में लगा था, तो कुछ लोगों ने देखा कि हवेली का वो बंद दरवाजा फूलों से लदा है। ऊपर से नीचे तक गेंदे के नारंगी फूल, बीच में गुलाबी गुलाब, पीले गेंदे की लड़ियाँ। ऐसा लग रहा था, जैसे वर्षों बाद हवेली ने नया श्रृंगार किया हो। ऊपर नीला आसमान और नीचे फूलों की बरसात।

पास वाले लल्लन चाय वाले ने पूछा – “अरे अम्मा, ये क्या? कोई त्योहार?”

अम्मा आँखें पोंछते हुए बोलीं – “हाँ बचवा! मेरा त्योहार ही तो है। आज बीस साल बाद मेरी गुड़िया आ रही है। बीस साल पहले इसी दरवाजे से डोली में विदा हुई थी। तब भी इसी तरह फूल सजाए थे। आज बीस साल बाद इसी दरवाजे से फिर गृहप्रवेश करेगी, अपने दो बच्चों के साथ।”

“ये तो बड़ी खुशी की बात है अम्मा। आज पहली बार आपको इतना खुश देखा है।”

अम्मा ने सुबह चार बजे उठकर खुद माली से फूल मंगवाए थे। हर फूल को अपने हाथ से टांका था।

शाम को जब बेटी आई, ऑटो से उतरते ही माँ को फूलों से सजे फाटक पर खड़ी देखा तो दौड़कर लिपट गई। हवेली का वो फाटक उस दिन सिर्फ फाटक भर नहीं था, बल्कि खुशियों की एक नई कहानी कह रहा था। एक माँ के बीस साल के इंतजार का अंत था, और एक नए आरंभ का अध्याय लिख रहा था। अम्मा का चेहरा आँसुओं से भीग रहा था, मगर उन आँसुओं के साथ एक आत्मसंतोष भी झलक रहा था, जो शायद एक माँ ही महसूस कर सकती है।

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921

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