कविता

चाँद पूनम का

अमर है ज्योत्स्ना उसकी, शरद की शीत है देखो,
शिफ़ा ये बटता जग को, तपस पर जीत है देखो।

उमस लू ग्रीष्म से मुक्ति, गगन की ओर तुम देखो,
सुखद शीतल लुभानी है, शरद की भोर तुम देखो।

वो छिपा है नीम के पीछे, जरा घर से मेरे देखा,
दिखे उगता वो चंबल से, जब छत से मेरे देखो,

चमक बस दूध सी देखो, फिर कोई भाग न देखो,
वो बर्फ सी शीत ओढ़े है, प्रिये कोई दाग न देखो।

छिपाने की मेघों की चेष्टा, सफल वो चाँद है देखो,
जगत में शुभ का है संचार, सभी मुख शाद है देखो,

हवा का जोश क्या बोलूं, फैलाये वो बाहें है देखो
दुब पर ओस हल्की सी, मोती मय राहें है देखो।

सुखद इतना लगता है, बस देखूँ इन नजारो को,
अपने आग़ोश में भर लूँ, चमकते चाँद तारो को।

ह्रदय बस चाह करता है, चाँद बस चाँद गाने की,
खड़ा है ओट कर बादल, नही हिम्मत छिपाने की।

है आती खीर की ख़ुश्बू, ह्रदय चाहे झूम जाने को,
रचाये रास कान्हा जी, कृपा माँ राधा की पाने को।

फैली स्निग्धता अनुपम, सोम नभ सोम है देखो
प्रणय वातावरण फैला, खड़े मेरे रोम है देखो

निशा इतनी सुहानी है, बहक जाये न हम देखो
चाँद सी तुम प्रिये प्यारी, मुझे ऐसे न तुम देखो

मेरी बाहों मे समा जाओ, जी लो इन नजारों को
चाँद है पूर्ण, रात चांदी, सोये न गिनते तारो को

खिला है चाँद पूनम का, जरा नभ में सभी देखो,
ये अमरता बाटती द्यु है, गगन अमृत सभी देखो।

— ऋषभ तोमर

ऋषभ तोमर

अम्बाह मुरैना

Leave a Reply