हंसगति छंद रचना
माँ आँचल शुचि छाँव, पिता सुख सागर।
गुरु शिक्षा सुखधाम, ज्ञान की गागर।।
अपनों का स्नेह, प्रेम रस धारा।
जीवन में आनंद, बंध शुुभकारा।।
किलकारी की गूँज, चहक आँगन में।
महके मुकुलित बाग, खुशी तन- मन में।।
भोला सा मासूम, बाल हर्षाता।
मातु-पिता का प्यार, नेह बरसाता।।
जीवन का ये खेल, कौन भरमाता।।
मन पर कसे लगाम, लोभ भटकाता।।
लालच के सँग अंत, अहितकारी का।
ऊँचा लहरे ध्वज, धर्म तारी का।।
विपदा में नित थाम, हाथ अपनों का।
हो आपस में नेह, साथ स्वजनों का।।
रहना मिलजुल एक, स्वार्थ को भूले।
इंद्रधनुष नव रंग, मगन हो झूले।।
