पीछे दौड़ रही है मौत
आगे पीछे खड़ी है यहाँ मौत ।
बारूद बन गई जीवन की सौत ॥
कहाँ पे ले जा रहा है ये जमाना ।
दीप से कैसे बच पायेगा परवाना ॥
विश्व में चल रही है वर्चश्व की लड़ाई ।
हर मानव के दिल में खौफ है समाई ॥
राजनीति की खींच गई है तलवार ।
नीला ग्रह पर आई है युद्ध तकरार ॥
दो देशों के बीच विरोध खड़ा है ।
हड़प नीति की दरवार अड़ा है ॥
नर ही बना नर का अब। दुश्मन ।
कौन हटाये अन्दर का काला चिलमन ॥
धर्म जाति की फैल गई है उन्माद ।
बिछ गई शतरंज की नई विसात ॥
खुशियों के घर छाई आज विषाद ।
क्या मिट जायेगा ज़ग की आबाद ॥
ओ रब शांति दूत बन कर तुम आना ।
हैवानों को घर घर जा कर समझाना ॥
इन्सानियत की तुम नई पाठ पढ़ान ।
शायद बदल जाये ये जालिम जमाना ॥
— उदय किशोर साह
