हास्य-व्यंग्य : कान से ली, जुबान से दी
निंदक औऱ निंदा समाज के आवश्यक तत्त्व हैं। इनके बिना समाज में गति नहीं आती। इसीलिए महात्मा कबीरदास ने सैकड़ों
Read Moreनिंदक औऱ निंदा समाज के आवश्यक तत्त्व हैं। इनके बिना समाज में गति नहीं आती। इसीलिए महात्मा कबीरदास ने सैकड़ों
Read Moreलगते फल डालें झुक जातीं। समझ सकें तो सबक सिखातीं।। तेज धूप में छाया देतीं। सब थकान अपनी हर लेतीं।।
Read Moreइस असार संसार में एक मात्र निर्मल प्राणी यदि कोई है, तो वह मनुष्य ही हो सकता है।इस बात को
Read Moreदेश और दुनिया का हर आदमी या औरत कोई कबीर नहीं है ;जो भरे बाज़ार खड़े होकर कहे: ‘कबिरा खड़ा
Read Moreअपने – अपने रेवड़ में खुश, भैं – भैं भेड़ें करतीं। मैं – मैं बकरा – बकरी करते, और नहीं
Read Moreरहते सूरज इतनी दूर। फिर भी दें गर्मी भरपूर।। देर नहीं पल की भी करते। अंबर में तुम नित्य विचरते।।
Read Moreशीतकाल सौगातें लाया। ठंडी ऋतु का मौसम भाया।। छोटे दिन की लंबी रातें। अगियाने पर होतीं बातें।। गरम रजाई ने
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