गीतिका
धुआँ -ए- पराली पिए जा रहा हूँ। हूँ इन्सां,पशु – सा जिये जा रहा हूँ।। न डर है किसी को
Read Moreचींटी जब पथ पर बढ़ती है। ऊँचे पर्वत पर चढ़ती है।। चढ़ती फिर नीचे गिर जाती। गिर गिर कर मंजिल
Read Moreआदमी ही आदमी को छल रहा है। आदमी से आदमी क्यों जल रहा है।। मान – मर्यादा हुई तार –
Read More(1) कितना वहशी हो गया , देखो रे इंसान। लाज – हया धो पी गया , दिखती कोरी शान।। दिखती
Read Moreसही समय विद्यालय जाते। बच्चे वही सफलता पाते।। जल्दी जगना जल्दी सोना। स्वस्थ देह दिमाग भी होना।। गुरु जी हमें
Read Moreबात -बात में शपथ लेने की बात करना कुछ लोगों का स्वभाव होता है। अपनी सौगंध , आपकी सौगंध, गंगा
Read Moreजो मेरा मनमीत बन गया। जीवन का संगीत बन गया।। जीवन की राहें रपटीली। उबड़ – खाबड़ और कँटीली।। हर
Read Moreसुबह हुई तो बाँग लगाता। मुर्गा गीत कुकड़ कूँ गाता।। कहता हमसे जागो प्यारे। आलस छोड़ो सुबह सकारे।। अपने साथ
Read More