हरि इच्छा
भविष्य के गर्त में क्या छिपा मालूम नहीं देखा था जो सपना चकनाचूर हुआ सजाए थे सपनों के महल जो
Read Moreशहर छोड़ लौट चलूं अब वापिस अपने गांव गांव छोड़ शहर आया था कुछ पाने और कमाने किया हिसाब तो
Read Moreक्या चलता किस के मन में जान नहीं सकता कोई कौन अपना कौन पराया बातों से पहचान सके नहीं कोई
Read Moreमालूम है दुनियां है फानी आनी और जानी फिर भी डरता है यह मन इसीलिए तो कैद है न होता
Read Moreहैरान परेशान सा भटक रहा इधर उधर इस बियावान में ऐसे जैसे मृग फटकता फिरता है जंगल जंगल कस्तूरी को
Read Moreसारा जोर है अगली सांस पर आती है या रुक जाती है मुझे फिक्र नहीं डोरी तो टूटनी है फिर
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