फुटपाथों की पीर
कलम ! दर्द से रुक मत जाना , फुटपाथों की पीर लिखूँगा । देख अन्नदाता के चेहरे ! आखिर क्यों
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Read Moreगाँव ! हमारा बचपन दे दे ! वह मिट्टी के सुघर खिलौने । वह काली बकरी के छौने । वह
Read Moreरात पूर्णिमा ,झंझा आया , धूमिल उजला चाँद हो गया । कुछ सपनों के चित्र सुनहरे । मेरे उर पट
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