मुक्तक/दोहा

बरगद और बुजुर्ग

बरगद और बुजुर्ग को मानता अब कौन है? वक्त के चक्र को भला जानता कब कौन है? अहमियत इन दोनों की कभी खत्म नहीं हो सकती, मगर वक्त रहते इनको पहचानता भला कौन है? सदियों से जनमानस‌ के हृदय में प्रेम का बीज बो रहे हैं| बूढ़े रीति-रिवाजों और परम्परा को अपने काँधे पर ढो […]

मुक्तक/दोहा

कुर्सी

कुर्सी की माया बड़ी , समझो इसका सार कुर्सी यदि मिलती नहीं तो जीवन धिक्कार इसीलिए कहता हूँ भैया समझो इसका अर्थ, कुर्सी गर मिलती नहीं ,समझो जीवन व्यर्थ समझो जीवन व्यर्थ नहीं कोई है आशा कुर्सी सबसे श्रेष्ठ यही जीवन अभिलाषा बिन प्रयास कुछ होत नहीं जीवन में भाई, नेता बनना अगर तुम्हें फिर […]