संस्कारों से खाली होती नई पीढ़ी का दर्दनाक सच
समाज की संवेदनहीनता अब कोई छिपी हुई बीमारी नहीं, बल्कि खुले घाव की तरह फैल रही है। जब कोई पिता,
Read Moreसमाज की संवेदनहीनता अब कोई छिपी हुई बीमारी नहीं, बल्कि खुले घाव की तरह फैल रही है। जब कोई पिता,
Read Moreसुरक्षा का तमाशा अजीब है—कटघरे में यात्री खड़ा होता है, चूक भीतर होती है। वह चुपचाप बैग खोलता है, जूते-बेल्ट
Read Moreसभ्यता का सबसे गहरा घाव किसी युद्ध, महामारी या आर्थिक संकट ने नहीं, उस चमकती स्क्रीन ने दिया है जिसे
Read Moreकानून की सबसे लंबी सजा कभी अपराधी को नहीं, न्याय को मिलती है। नशा मुक्त भारत का मौजूदा अभियान इसी
Read Moreजब जीवन बहुत कुछ सिखा देता है, तब इंसान हर आवाज़ का जवाब देना और हर लड़ाई लड़ना छोड़ देता
Read Moreकुछ फैसले दिमाग में नहीं, मनुष्यता की भीगी तहों में जन्म लेते हैं। वे तर्क से नहीं, अनदेखे दर्द की
Read Moreराजनीतिक विरासत उपाधियों या पारिवारिक पहचान से नहीं, जनविश्वास, वैचारिक दृढ़ता और जनसंघर्ष से निर्मित होती है। कुछ व्यक्तित्व इतिहास
Read Moreलोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना गलती होना नहीं, बल्कि उसे उपलब्धि के प्रमाणपत्र से ढक देना है। जब सच कागजी
Read Moreशिकायतों की सूची लंबी है—अस्पताल में दवा नहीं, स्कूल में शिक्षक नहीं, सड़क पर रोशनी नहीं, कार्यालय में कर्मचारी नहीं।
Read Moreउत्सव कभी केवल मनुष्य के आयोजन नहीं थे; वे प्रकृति के साथ हमारी मौन आत्मीयता के प्रतीक थे। हमारी सांस्कृतिक
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