मुक्तक/दोहा

मुक्तक

जीने की ख़ुशी, न मरने का गम है, मानव मिला तन, यही क्या कम है। किया क्या है हमने, यह तन पाकर, जीवन मरण का, यह कैसा भ्रम है? डरते नहीं हम मरने से, लेकिन, जीने का मक़सद, हमारा कर्म है। संस्कार संस्कृति, हमारी विरासत, पुरातन होने का, हमको न गम है। मर्यादा में रहना, […]

मुक्तक/दोहा

गाँधी-वंदना के मुक्तक

(1) मुझे गांधी ने सिखलाया,जिऊँ मैं कैसे यह जीवन। बनाऊँ कैसे मैं इस देह और मन को प्रखर,पावन। मुझे नैतिकता-पथ दिखलाके,रोशन आत्मा कर दी, पूज्य बापू के कारण ही,महकता है मिरा मधुवन।। (2) जिये सत् भाव लेकर गांधी,सौंपा हमको यह ही स्वर। अहिंसा-ताव लेकर बन गये,मानव से वे इक सुर। युगों तक वंदना गांधी की […]

मुक्तक/दोहा

सनातन

आओ हम अपनी ढपली, अलग-अलग बजाते हैं, हिन्दू से ब्राह्मण बनिये, दलित अलग हो जाते हैं। ठाकुर जाट गुर्जर कुम्हार, गडरियों को भी बाँटों, अगडे पिछड़े स्वर्ण बोद्ध जैन, सब अलग हो जाते हैं। जाने कितने फिरके मुस्लिम, पर मुस्लिम कहलाते हैं, ईसा में भी अलग-अलग, सब ईसाई ही कहलाते हैं। सब धर्मों के अनुयायी, […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक

आसमां की चाहतें लेकर चला था, चाँद मुट्ठी में होगा सोचकर चला था। क्या मिला परवाह नहीं की मैंने कभी, बुलन्द हौसलों की उँगली पकड़ चला था। कुछ मिला तो ख़ुश हुआ कुछ तो मिला, कुछ नहीं पर मस्त हूँ नया रास्ता मिला। उम्र बढ़ना है बढ़ते अनुभवों की कहानी, ज्ञान था मगर सच का […]

मुक्तक/दोहा

छब्बीस दोहे “मुखरित है शृंगार”

प्रीत-रीत का जब कभी, होता है अहसास।मन की बंजर धरा पर, तब उग आती घास।१।—कुंकुम बिन्दी-मेंहदी, काले-काले बाल।कनक-छरी सी कामिनी, लगती बहुत कमाल।२।—मौसम आवारा हुआ, मुखरित है शृंगार।नेह-नीर का पान कर, सुमन बाँटते प्यार।३।—लगे चहकने बाग में, पत्ते कलियाँ-फूल।जंगल में हँसने लगे, बेरी और बबूल।४।—कंकड़-काँटों से भरी, प्यार प्रीत की राह।पूरी हों इस जनम में, […]

मुक्तक/दोहा

हाइकु मुक्तक

हुआ सवेरा/पंछी चहचहाये/नींद उड़ाये अपनापन / अनमोल सौगात/प्यार जगाये रिश्तों की पूँजी/भावनाओं का मेल/ है धरोहर चाहतें नई/शालीनता सहेली/उम्र सिखाये । कौन अल्हर/ मासूम बचपन/ना मेरा मन आभाषी मंच/उत्सव सा आनंद/ चिंतित मन प्रकृति प्रेम/बागवानी का शौक/मिले आनंद बाग बगीचे/मनोहर लगते/करूँ जतन प्रेम संम्बंध/रिश्तों की मर्यादा में/पंख फैलाये बावड़ा मन/ मन के हिंडोले में/उड़ता जाये […]

मुक्तक/दोहा

दोहे “शेर-दोहरे छन्द”

माता के वरदान से, होता व्यक्ति महान।कविता होती साधना, इतना लेना जान।।—कविता का लघु रूप हैं, शेर-दोहरे छन्द।सन्त-सूफियों ने किये, दोहे अधिक पसन्द।।—दोहों में उपदेश हैं, शेरों में जज्बात।दोनों छन्दों में अलग, होते हैं हालात।।—दोहे हिन्दी की विधा, उर्दू के हैं शेर।इश्क-मुश्क का शेर में, लगा हुआ है ढेर।।—दोहा रचना है नहीं, इतना भी आसान।कर […]

मुक्तक/दोहा

खेल खेलती जिंदगी

समझ सके ना जिंदगी ,समझ सके ना प्रीत,जीवन भर सुनते रहे ,बस जीवन संगीत। आती जाती जिंदगी ,बदले पल पल रंग ,कभी दुखों से दोस्ती ,कभी ख़ुशी से जंग। बोल रही है जिंदगी ,कर ले ज़रा प्रयास ,यूं ही हार न मानना ,नहीं छोड़ना आस। भूली भटकी जिंदगी ,रचती नित इतिहास ,जो गुलाब को चाहते […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक

इतिहास की परतें खुलेंगी धीरे धीरे, सत्य से धूल की चादर हटेगी धीरे धीरे। ली है अभी अंगड़ाई हिन्दू ने थोड़ी थोड़ी, नींद से भी जागेगा सनातन धीरे धीरे। क्या-क्या लिखा इतिहास मे, किसने लिखा, हारे सिकन्दर का गौरव गान, किसने लिखा? किसने बताया भारत को, अनपढ़ गँवारों का देश, भूखा नंगा पिछड़ा था भारत, […]

मुक्तक/दोहा

दोहे “नहीं शीत का अन्त”

कुहरा नभ पर देख कर, सहमा हुआ पलाश।कैसे आयेगा भला, उपवन में मधुमास।—धूप धरा पर है नहीं, ठिठुर रहा है गात।आशाओं पर हो रहा, घना तुषारापात।।—टेसू चिन्तित हो रहा, सरसों हुई उदास।सरदी में कैसे उगे, जीवन में उल्लास।।—सूर्य उत्तरायण हुआ, नहीं शीत का अन्त।थरथर-थरथर काँपता, सिर पर खड़ा बसन्त।।—जाते-जाते शीत तो, दिखा रहा है रूप।घर-आँगन […]